Thursday, June 7, 2012

अजीब देश है हमारा भी !!!


 मुझे लगता है भारत में 4 और संस्थाओ को एक अलग देश घोषित कर देना चाहिए क्यूंकि ये भारत के संविधान और कानून का खुल्लम खुल्ला मजाक उड़ाती है और भारत का कानून एक असहाय की भांति बस उनका मुह देखता है  :

पहली स्वतंत्र संस्था है मुस्लिम  पर्सनल ला बोर्ड :
चूँकि कोई भी देश कानून और संविधान से चलता है और जाहिर सी बात है देश के अंदर रहने वाले सभी नागरिक इसी कानून का पालन करते है लेकिन भारत के अजीबोगरीब देश है यहाँ पर शादी के लिए जो उम्र हमारे कानून  में है वो लडकियों के लिए कम से कम 18 और लडको के लिए कम से कम 21 है लेकिन ये कानून देश के अंदर रह रहे मुस्लिमो पर लागु नहीं होता मुस्लिम लडकियो की शादी 15 साल पर भी हो सकती है भले ही इस उम्र में वो शादी का मतलब भी न समझती हो लेकिन वो ऐसा कर सकते है धर्म के आधार पर कानून बनाने का ये अनूठा तरीका है और इसी बात का फायदा उठा के सुनने में आया है की चूँकि मुस्लिम धर्म में  खून का खास महत्व है इसी लिए हर धार्मिक उत्सव में वो किसी न किसी  जानवर को काटते ही है  इस लिए सरकार विचार कर रही है की हर एक मुस्लिम को 3 खून करने की आज़ादी हो जिस से की उनकी धार्मिक स्वतंत्रता बनी रहे और भारतीय संविधान जिसके अनुसार यहाँ पर सभी धर्मो को अपने धार्मिक कार्यो पर आज़ादी मिलनी चाहिये वाली धारा सच हो सके !!!!!!!!!!!
इनमे से दूसरी संस्था है हमारी फ़िल्मी दुनिया यानि की बॉलीवुड :
कोई भी कानून या कोई एक्ट अगर बॉलीवुड के खिलाफ हुआ तो बॉलीवुड के सरे सदस्य पानी पी पी के सरकार और कानून को कोसने लगते है और कोसा तो खबरों में और अगर समर्थन कर दिया तो खबरों में जैसे की 
डर्टी पिक्चर को रात में प्राइम टाइम में न दिखने पर खबर सुर्खियो में थी की बॉलीवुड ने इसका जमकर विरोध किया|
शाहरुख़ खान को अमेरिका तंग करता है तो खबर आती है बॉलीवुड ने इसका जोरदार विरोध किया जैसे बॉलीवुड पुरे भारत से अलग है इसी का फायदा उठा के बॉलीवुड ने निर्णय लिया है की कोई कानून बनाने या भ्रष्ट नेता को बचाने में बॉलीवुड अब एक स्वतंत्र संस्था के रूप में आगे आएगी और बन्दर माफ़ कीजियेगा शाहरुख़ खान इसके मुखिया होंगे 
तीसरी स्वतंत्र संस्था है भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड :
चाहे भारत का कानून लाख मना कर दे लेकिन होगा वही जो भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड का मन होगा चाहे हो IPL का दूसरा संस्करण सरकार के मनाही के वावजूद कही और खेलना या फिर   IPL में  ड्रग्स और काले धन का खुल्लम खुल्ला उपयोग भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड ने भी तय कर लिया है की अब हम स्वतंत्र है सुन ने में आया है की भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड ने अब तय किया है की वो भी अब अपना जोर क्रिकेट में लगाने के वजय अपने खिलाडियो को नेता बनाने और चुनाव प्रचार करने में लगाएगी और चूँकि पैसो की खूब संभावना है इस क्षेत्र में इस लिए भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड जो की पैसो के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है इसे बुरा नहीं मानती |
चौथी संस्था है भीड़ 
जी हा जितना देश को पडोसी दुश्मन देश से डरना चाहिए उतना तो वो तो यहाँ भीड़ से डरती है जैसे की कसाब को फंसी नहीं दी जा सकती नहीं तो भीड़ कश्मीर में दंगा कर देगी, अफजल गुरु को फाँसी देने से देश में पागल भीड़ माहौल खराब कर सकती है, एक मुख्यमंत्री के हत्यारे को इसी भीड़ के डर से फाँसी नहीं दी जा सकी, सुन ने में आया है की अब आतंकवादी भी अपने लिए भीड़ की व्यवस्था करेंगे और जहा भी लगा की कुछ गड़बड़ है उनके लिए बस उनकी भीड़ आ जाएगी उनको बचाने ऐसे ही जैसे की कुछ नेता अपने लिए किराये की भीड़ इकट्ठी करते है ! अब तो अपराधियो ने भी अपनी एक भीड़ तैयार करने की सोच रही है ताकि कानून और पुलिस से बचा जा सके और कुछ भी करे और तुरंत भीड़ इकट्ठी कर ले | 
~~ अक्षय 


Monday, May 28, 2012



                     श्री विनायक दामोदर सावरकर 


स्वातंत्र्यवीर सावरकर का सवतंत्र भारत में क्या स्थान है ? न तो उन्हें भारत रत्न दिया गया , न संसद के केंद्रीय कक्ष में उनका चित्र लगाया गया, न संसद के अंदर या बहार उनकी मूर्ति स्थापित की गयी, न उन पर अभी तक कोई बढ़िया फिल्म बने गयी, न उनकी जन्म-शताब्दी मनाई गयी और न ही उनकी जन्म-तिथि और पुण्य-तिथि पर उनको याद किया जाता है जबकि वो इसके सबसे अच्छे उमीदवार थे कम से कम कुछ भ्रष्ट, ढोंगी, और विलासी नेताओ से तो अच्छे तो थे ही पर ये हमारे देश का एक तरह से दुर्भाग्य ही है की माँ भारती के सच्चे पुत्र को आज विदेशी कथित भारतीय सरकार श्रधांजली भी नहीं देती | आइये हम जानते है अपने वीर सावरकर के बारे में कुछ | 

श्री विनायक दामोदर सावरकर वर्तमान काल में महान क्रान्तिकारियो में से एक थे | उन्होंने अपना सारा जीवन भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया | वह महान स्वतंत्रता सेनानी थे | उनका जन्म 28 मई, 1883 को जिला नासिक के भगुर नमक ग्राम में हुआ | वह शिवाजी, राणा प्रताप और सदाशिव राव भाऊ की जीवनियो से अत्यंत प्रभावित हुए| उन्होंने 1901में मेट्रिक की परीक्षा उतीर्ण की | उसी वर्ष उनका विवाह हुआ |फिर उन्होंने पूना के फर्गुसन कालेज में प्रवेश लिया | वे वह गीतों की रचना की, जिससे युवाओ को भारत माता के लिए सर्वस्व अर्पण करने की प्रेरणा मिली | अंग्रेजी सरकार ने उनकी पुस्तको पर प्रतिबन्ध लगा दिया |
1905 में अंग्रेजी शासन ने बंगाल का विभाजन कर दिया | सारे देश में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी | युवा सावरकर ने bhi इसमें भाग लिया | उन्होंने पूना में विदेशी कपड़ो की होली जलाई | उन्हें कालेज से निकल दिया गया | उन्होंने भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु एक गुप्त संगठन 'अभिनव भारत' की स्थापना की | उन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उतीर्ण की | अगले वर्ष वे इंग्लैंड में विधिशास्त्र का अध्ययन करने गए | भारत की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने वहा आन्दोलन की | वह के भारतीय छात्रो ने इसमें भाग लिया | वे वह बमों का निर्माण करके भारत में पहुचाते |
1
जुलाई 1909 को एक पंजाबी युवक मदन लाल ढींगरा ने कर्जन वेली का वध किया और उसी वर्ष वीर सावरकर के एक साथी ने जैक्सन का नासिक में वध किया | अंग्रेजी सरकार का विश्वास था की उनका वध सावरकर की प्रेरणा से हुआ | इसीलिए उन्हें इंग्लैंड में गिरफ्तार कर लिया गया | उनके बड़े भाई श्री गणेश सावरकर को जैक्सन की हत्या का दोषी करार दिया गया और उन्हें बीस वर्ष की सजा सुनाई गयी | सावरकर ने विधि की परीक्षा तो उतीर्ण की पर उन्हें अंग्रेजी सरकार से संघर्ष करने के कारण उपाधि प्रदान न की गयी| उन पर मुकदमा चालाने के लिए भारत में भेजने का निर्णय लिया गया | एक समुद्री जहाज भारत की ओर रवाना हुआ | रस्ते में ही वीर सावरकर गहरे समुद्र में चुपचाप कूद गए और तैर कर फ़्रांस के तट पर पहुच गए | फ़्रांसिसी सरकार ने उन्हें अंग्रेजी सरकार के हवाले कर दिया | भारत में उन्हें अनेक घटनाओ में दोषी करार कर दिया गया | 24 दिसम्बर, 1910 को उन्हें 50 वर्ष की सजा सुनाई गयी | उन्हें अंडमान द्वीप में "कालापानी" की सजा हुयी | अंडमान में उनसे क्रूर व्यव्हार किया गया| जिससे की उनका स्वस्थ्य बिगड़ गया और 1920 में तो ऐसी स्थिति थी की उनकी जीर्ण-अवस्था के कारण उन्हें रिहा करने की मांग की| उसके पश्चात उन्हें अंडमान से रिहा कर भारत के जेल में बंदी किया गया | २७ साल की कठोर जेल यात्रा के पश्चात उन्हें 1937 में रिहा किया गया |
वीर सावरकर से कई बार कांग्रेस में शामिल होने का आग्रह किया गया परन्तु उन्होंने स्वीकार नहीं किया क्यूंकि वो हिंदुत्व के लिए कार्य करना चाहते थे | वह हिन्दू महासभा में शामिल हुए और सात वर्ष तक इसके अध्यक्ष भी रहे | उनहोंने भारत के स्वतंत्रता के लिए भी संघर्ष जारी रखा | इन सात वर्षो में कठोर परिश्रम के कारण उनका स्वस्थ्य बिगड़ गया | अत: चिकित्सको की सलाह पर वह सक्रिय गतिविधिओ से दूर रहे |
जब वह रोगग्रस्त अवस्था में थे, तो भारत स्वतंत्र हुआ| परन्तु देश का भारत और पाकिस्तान के रूप में विभाजन हुआ | इससे वीर सावरकर बहुत दुखी हुए, परन्तु उन्हें संतोष हुआ की अंत में भारत सवतन्त्र हुआ |
26,
फरवरी 1966 को अपनी लोक्लिला पूरी करने के पश्चात् वह सदा के लिए हमारे से बिछुड़ कर परमगति को प्राप्त हुए 

| भारतीयों ने अपना एक महँ देशभक्त व् क्रन्तिकारी खो दिया |

Saturday, May 5, 2012

अजीब देश है हमारा भी.....


अजीब देश है हमारा भी.....

धर्मनिरपेक्षता: यूँ तो इस शब्द का अर्थ है की हमारे देश में सभी धर्म एक साथ एक अधिकार के साथ रह सकते है लेकिन हमारे देश होता है बिलकुल इसके उल्टा आज धर्म निरपेक्षता का दुरूपयोग खुलेआम कुछ लोगो और सत्ता में बैठे कुछ  दुराचारियो द्वारा किया जा रहा है और मजे की बात तो ये है की देश का बहुसंख्यक  वर्ग  हिन्दू इस मामले पर आँख मुड़े हुए है उसे जरा सा भी इस बात का अहसास नहीं है की अगर इस दुरूपयोग को न रोका गया तो आने वाले दिनों में हिन्दुओ की  दशा तरस खाने वाली हो जाएगी, धर्मनिरपेक्ष होना अच्छी बात है लेकिन धर्म के प्रति उदासीन होना गलत बात है. मेरे दिमाग में रह रह कर के प्राचीन यूनान के स्पार्टा साम्राज्य के समाज व्यवस्था की याद आ जाती है जहा पर कुछ हजार स्पार्टन लाखो की संख्या में स्पार्टा में बसे  "हैलोट" पर राज्य करते थे. हजारो में बसे स्पार्टन कानून और नियम बनाते और हैलोट बेचारे बस काम और मेहनत करके खा पीके सो जाते थे और उनका यही दिनचर्या बन गया था नतीजा ये हुआ की वो गुलामो की जिंदगी बिताने लगे और उनका जीवन दोयम दर्जे के गुलामो की तरह हो गयी थी जिन्हें अपने अधिकार और अपने देश के बारे में कुछ बोलने का अधिकार ही नहीं था उनका और वो एक आम नागरिक से धीरे धीरे गुलाम बन गए जबकि वो संख्या में राज्य करने वाले स्पार्टन से कई गुना अधिक थे. ये एक आदर्श उदाहरण हो सकता है उनके लिए जो अपने अधिकारों का उपयोग नहीं करते कुछ ऐसी ही समस्या हमारे हिन्दू भाइयो के साथ है उनके लिए अधिकारों की बात करना अपना समय बर्बाद करना या बकवास करने जैसा है और बोलने पर बोलते है की हमारे बाप का क्या जायेगा सच भी है हमारे बाप का कुछ नहीं जायेगा क्यूंकि वो तो अपनी जिंदगी आजाद देश में जी रहे है लेकिन क्या हम और क्या हमारी आने वाली पीढ़ी आजाद रहेगी. अगर आपको  लग  रहा है की मैं बस ऐसे ही बकवास कर रहा हु तो आप खुद ही देख लीजिये की आने वाले दिनों में हमारे साथ क्या क्या हो सकता है |

1) अभी कुछ दिन ही पहले हैदराबाद के अपने को  धर्मनिरपेक्ष ( सेकुलर) कहने वाले MIM पार्टी के MLA  अकबरुद्दीन ओवैसी है की उन्होंने  ये मांग की थी  कि हैदराबाद के भाग्यलक्ष्मी मंदिर में घंटी नहीं बजनी चाहिए क्यूंकि घंटी कि आवाज मुस्लिमो के लिए हराम माना जाता है और हैरानी कि बात  ये है कि हमारी केंद्र सरकार से आग्रह करने पर हमारी महान सेकुलर सरकार ने घंटी बजने पर रोक भी लगा दी थी

2) इन्ही अकबरुद्दीन ओवैसी ने यह भी मांग कि थी कि रामनवमी के दिन कोई जुलुस न निकली जाये इससे माहौल बिगड़ने का डर है

3) इन मुस्लिमो कि हिम्मत इतनी बढ़ गयी है कि उन्होंने रामनवमी के जुलुस का बदला लेने  के लिए एक बेजुबान और प्रकृति में ममता कि साक्षात् मूर्ति गाय को काट के एक पास के मंदिर में फेक दिया और झड़प शुरू हो गया और मुस्लिम पहले से ही तैयार बैठे थे और हम कुछ नहीं कर पाए

4) पाकिस्तान से आये हिन्दुओ को सरकार भारत में रखना नहीं चाहती और बंगलादेश के करीब 3 करोड़ मुस्लिम और हाल ही में बर्मा से भाग कर आये करीब 500 शरणार्थियो  को जगह और भोजन दोनों दिया जा रहा है

5) अगर कोई हिन्दू किसी और धर्म के खिलाफ उपर के किसी भी कार्य को अंजाम दे देता है तो लगता है वो एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है और सतासीन के एक नेता जो कि राष्ट्रीय कुत्ते का का ख़िताब पा चुके है लगते है भौकने लेकिन उपर के किसी भी मुद्दे पर बेचारे ने कही अँधेरे में जाके मुह काला  करना ही उचित समझा

अब कोई बताएगा कि अपनी अपनी श्रद्धा से पूजा करना और जुलुस निकलना भी मुस्लिम बहुल इलाको में गुनाह हो गया है या फिर मुस्लिम इन इलाको को पाकिस्तान और सउदी अरब मान बैठे है जहा दुसरे धर्म कि उपासना करना एक गुनाह ही माना जाता है अगर ये दोनों में से कोई भी है तो ये मुस्लिमो के लिए बहुत ही नुकसान करने वाली बात है वो यहुदियो वाली काम न करे जिसके चलते पुरे यूरोपे से यहुदियो का सफाया हो गया और आज भी वो हाथ पर गिन ने लायक ही बचे है, बार बार हिन्दू मुस्लिम भाई भाई बोलने वाले सेकुलर नस्ल के संकर समाज से मैं बस इतना पूछना चाहता हु कि क्या वो इन सब घटनाओ के बाद भी ऐसा बोलने का हौसला रखते है अगर हा तो उन सभी सेकुलर नपुन्सको को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए कम से कम उनकी कायरपन तो किसी को पता नहीं चलेगी वैसे भी गलती हिन्दुओ कि है उनकी मानसिकता ही गुलामो वाली हो गयी है बस कमाओ और खाओ भाई राजनीती और अपने अधिकार कि बात करना हमारे बस कि बात नहीं है, और तो और उस सत्तासीन पार्टी को तो हमें सीधा भारत छोडो का ज्ञापन देना चाहिए उन्हें भारत में ही रहने का कोई अधिकार नहीं है, उपर के सभी उदहारण से हम क्या समझे कि हमारी सरकार हमसे ज्यादा महत्व मुस्लिमो को देती है या फिर हमें अपने अधिकारों के प्रति सचेत ही नहीं है. अभी भी बहुत समय है हम चेत गए तो अच्छा है नहीं तो फिर वही होगा जो अभी से हमें कही कही मुस्लिम बहुल इलाको में देखने को मिल जाता है.

Sunday, October 2, 2011

लाल बहादुर शास्त्री और देश को उनका दिया गया योगदान


2 अक्टूबर के दिन भारत के दो महापुरुषों के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है | महात्मा गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री दोनों भारत के दो महान सपूत जिन्होंने अपने कर्म से भारत को दुनिया के सामने और भी गौरवान्वित किया| लेकिन  दुःख इस बात का है की हमारे प्रधान मंत्री जो की एक महान और ईमानदार नेता और कुशल प्रशासक थे उनको एक दम से नजरंदाज कर देना कितनी दुखद बात है |
लालबहादुर शास्त्री (2 अक्तूबर, 1904 - 11 जनवरी, 1966),भारत के तीसरे और दूसरे स्थायी प्रधानमंत्री थे । वह 1963-1965 के बीच भारत के प्रधान मन्त्री थे। उनका जन्म मुगलसराय, उत्तर प्रदेश मे हुआ था।
लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में लाल बहादुर श्रीवास्तव के रुप में हुआ था। उनके पिता शारदा प्रसाद एक गरीब शिक्षक थे, जो बाद में राजस्व कार्यालय में लिपिक (क्लर्क) बने।
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रुप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में प्रहरी एवं यातायात मंत्री बने। यातायात मंत्री के समय में उन्होनें प्रथम बार किसी महिला को संवाहक (कंडक्टर) के पद में नियुक्त किया। प्रहरी विभाग के मंत्री होने के बाद उन्होने भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए लाठी के जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारंभ कराया। 1951 में, जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व मे वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों मे कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिए बहुत परिश्रम किया।
जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद, शास्त्री जी ने 9 जुन 1964 को प्रधान मंत्री का पद भार ग्रहण किया।
लालबहादुर शास्त्री का जीवन लखनऊ से दिल्ली तक काफी उथल-पुथल भरा रहा। आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में गोविंदबल्लभ पंत जब मुख्यमंत्री बने तो लाल बहादुर शास्त्री को उत्तर प्रदेश का गृहमंत्री बना दिया गया। प्रयाग विश्वविद्यालय के गंगानाथ झा छात्रावास में नवंबर 1950 में एक आयोजन हुआ जिसमें लालबहादुरजी मुख्य अतिथि थे। नाटे कद व कोमल स्वभाव वाले शास्त्री को देखकर किसी को कल्पना भी नहीं थी कि वह कभी भारत के दूसरे सबसे सफल प्रधानमंत्री बनेंगे। 1951 में बेंगलूरू में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नेहरू ने संपूर्णानंद की सलाह पर जवाहर लाल नेहरू ने लालबहादुर शास्त्री को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महामंत्री नियुक्त करा दिया, लेकिन लालबहादुर शास्त्री ने अनमने मन से ही पद ग्रहण किया। लालबहादुर शास्त्री ने महामंत्री पद तो ग्रहण कर लिया, परंतु सामने 1952 का प्रथम आम चुनाव एक बड़ी समस्या बन गया। नेहरू प्रधानमंत्री थे और उन्हीं की तरह लालबहादुर शास्त्री भी उच्च नैतिक मूल्यों वाले व्यक्ति थे। वह किसी उद्योगपति से धन मांगना नहीं चाहते थे।
दिखने में साधारण और छोटे शास्त्री जी एक विशुद्ध गाँधी वादी और सादगी से रहने वाले इंसान थे भारत के प्रधान मंत्री होते हुए भी उन्होंने कोई घर नहीं ख़रीदा था, 1965 का वो दिन जब पाकिस्तान ने अचानक ही भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया और उसके बाद तीनो सेनाओ के प्रमुखों के साथ बैठक में साफ साफ कह दिया की जो आपलोगों को करना है कीजिये और बताइए मैं आपलोगों के लिए क्या कर सकता हु और उसके बाद इतिहास गवाह है की इतना मुह तोड़  जवाब पाकिस्तान को शायद ही कभी मिला हो रात को 11 बजे 350 लड़ाकू जहाजो के काफिले ने कराची से लेकर पेशावर तक पाकिस्तान को ध्वस्त कर दिया और ऐसा गहरा जख्म दिया  जिसे वो भूल नहीं पाए और उसके बाद शुरू हुआ अमेरिका का गन्दा खेल उसने धमकी दी की वो गेंहू की खेप रोक दी जाएगी  जो की उन दिनों हम अमेरिका से मंगाते थे लेकिन शास्त्री जी ने साफ साफ बोल दिया की हम आपके बहकावे में नहीं आयेंगे और कहा की हम आधी पेट खा कर भी ये युद्ध लड़ेंगे और पुरे देश में बहुत सारे लोगो ने जिन्होंने उनका अनुसरण किया और तब तो और भी हद हो गयी जब अमेरिका ने अपना युद्ध पोत लाकर अरब सागर में खड़ा कर दिया मानसिक दबाव के लिए लेकिन शास्त्री जी इन सब से बगैर बिचलित हुए अपना रुख जरी रखा और लगे हाथ चीन ने भी धमकी दे दी की भारत अपने कुछ हथियारका उपयोग चीन के क्षेत्र में भी कर रहा है लेकिन चीन को भी वैसा ही जवाब मिला जैसा की अमेरिका को मिला था और  शास्त्रीजी ने इस युद्ध में पं. नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सब एकजुट हो गए। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी नहीं की थी। क्या अब के नेताओ में ऐसी मानसिक मजबूती है ? जिनके लिए रणनीति का मतलब बस अपने विपक्ष के नेताओ के खिलाफ ही बनाना है वो क्या कभी ऐसा कठोर कदम और मानसिक दृढ़ता दिखा पाएंगे ?
जनवरी 11 को भारत और पाकिस्तान के बीच समझौते के लिए उस समय के संगठित रूस और आज के उज्बेकिस्तान के शहर ताशकंद शास्त्री जी गए हुए थे और अगले ही दिन दिल का दौरा पड़ने के चलते उनका निधन हो गया वो भारत के पहले प्रधान मंत्री है जिनका निधन कार्यकाल में हुआ | उनकी मौत को लेके अभी भी रहस्य ही है जैसा की उनकी पत्नी ने दावा किया था की उनको जहर दिया गया है और बाद में रूस के एक खुफिया संस्था ने भी ये दावा किया  उन्हें जहर दिया गया है|
शास्त्रीजी
को उनकी सादगी, देशभक्ति और इमानदारी के लिये पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हे वर्ष 1966 मे भारत रत्न से सम्मनित किया गया। उनके याद में दिल्ली में एक स्मारक बनाया गया है जिसका नाम विजय घाट है
2005 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में लोकतंत्र और शासन नाम का एक कुर्सी की निर्माण दिल्ली विश्वविद्यालय में किया |
--अक्षय कुमार ओझा (akshaykumar.ojha@gmail.com)