Sunday, May 3, 2015

भारत महान के दो महान दुश्मन - नेहरू और जिन्ना

भारत महान के दो महान दुश्मन - नेहरू और जिन्ना
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भारत महान के दो दुश्मन रहे हैं - नेहरू और जिन्ना। कहते हैं कि भारत के स्वतन्त्र होने की भनक लगते ही सत्ता लोभियों में प्रधान मंत्री बनने की होड़ लग गयी।
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एक और जिन्ना स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनकर सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेना चाहते थे और दूसरी और नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने का गौरव हासिल करना चाहते थे। इन दोनों ही प्रधानमंत्री पद-लोलुपों ने भारत देश को हिंसा और नफरत की आग में झोंक दिया। सम्पूर्ण भारत के विभाजन का अमिट कलंक भी इन्हीं दोनों नेताओं के माथे पर लग गया।
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यदि जिन्ना प्रथम प्रधानमंत्री बनना चाहते थे तो बनने देते और अगले पाँच वर्ष बाद नेहरू प्रधानमंत्री बन जाते तो क्या हानि होती ?
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कहते हैं कि इस मुद्दे पर दोनों प्रधानमंत्री पद-लोलुप किसी भी कीमत पर राज़ी नहीं हुए और अंततः धर्म आधारित भारत महान के बटवारे का फैसला लिया गया जिसके परिणाम में मुस्लिम धर्म आधारित पाकिस्तान का जन्म तो हो गया किन्तु शेष भारत को नहीं हिन्दू-राष्ट्र घोषित करने को नेहरू प्रस्तुत हुए और भारत में छद्म धर्मनिरपेक्ष शासन की व्यवस्था दी गयी जिसके परिणामस्वरूप सब कुछ छद्म ही होता चला गया।
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क्या यह धर्मनिरपेक्षता का फार्मूला भारत के बटवारे से पूर्व किसी देशप्रेमी या राष्ट्रप्रेमी के मन में नहीं आया ? आखिर ऐसा क्यों नहीं हुआ और भारत महान का बटवारा क्यों हुआ धर्म पर आधारित ?
कांग्रेस पार्टी सबसे पहली पार्टी थी जिसने बूथ लूटने की प्रथा की शुरुआत की. बिहार के बेगुसराय में पहली बार ऐसी घटना सामने आई. कांग्रेस को चुनाव जीतने का नया फार्मूला मिल गया. चुनाव के समय गुंड़ों को भाड़े पर लिया जाने लगा. हिंसा और बूथ लूट कर चुनाव जीतने का प्रचलन शुरु हो गया. अस्सी के आखिरी दशक तक इन गुंड़ों को समझ में आ गया कि जब बूथ लूट कर ही चुनाव जीते जा सकते हैं तो वो दूसरों के बजाय खुद के लिए क्यों ने लूटें.. तो इस तरह कांग्रेस की वजह से देश की राजनीति का अपराधीकरण हो गया. गुंडे बदमाश लूटेरे जनप्रतिनिधि बनने लग गए. कई क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फार्मूला को अपनाया और नब्बे के दशक में को कमजोर हो गई..
कांग्रेस ने फिर एक नई नीति बनाई. उन्होंनें देश में भर में एनजीओ या गैर-सरकारी संस्थानों को बनाना शुरु किया. इन्हें सरकार और विदेशों से पैसे मिलते रहे. सरकार की तरफ से इन्हें समाज में काम करने की छूट दी गई. कई सरकारी योजनाओं को इनके हवाले कर दिया गया. देश के कई इलाकों में एनजीओ ने जनआंदोलनों का रूप ले लिया. धीरे धीरे एनजीओ ने समाज में अपनी पैठ बना ली और सरकार ने इन्हें ईमान और पुरस्कार देकर इनकी विश्वसनीयता को मजबूत किया. वैसे तो ये राजनीति से दूर रहते थे लेकिन चुनाव के समय ये लोग कांग्रेस पार्टी और उनके साथियों के लिए प्रचार-प्रसार का काम करते रहे.. कांग्रेस के लिए चुनाव जीतना आसान हो गया यही वजह है कि पूरे देश में कांग्रेस खिलाफ महौल होने के बावजूद कांग्रेस चुनाव जीतती रही. यही वजह है कि सोनिया गांधी के नेशलन एडवाइजरी कमीशन के सभी सदस्य एनजीओ चलाने वाले लोग हैं.
अब देश के एनजीओ के यह समझ में आ गया है कि अगर उनकी मेहनत से कांग्रेस चुनाव जीत जाती है तो वो खुद के लिए मेहनत क्यों करें. और स्वयं ही लोकसभा और विधानसभाओं में क्यों न जाएं... आम आदमी पार्टी का इतिहास भी एनजीओ का है.. धीरे धीरे देश के सारे एनजीओ वाले इस पार्टी शामिल होगें... इसी तरह देश की राजनीति का एनजीओकरण हो जाएगा..
कांग्रेस पार्टी की यह त्रासदी है कि यह भस्मासुर पैदा करती है.. पहले अपराधीकरण का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा और अब राजनीति के एनजीओकऱण का नुकसान उठाने वाली है.. यह मान लेना चाहिए कि अगले दस सालों तक कांग्रेस पार्टी का ग्राफ धरातल की ओर अग्रसर रहेगा..
...In Pakistan or bangladesh "there is No BJP/RSS" then why we see/read news daily of Riots/bomb blasts (killing innocent Muslim/Hindu People) whey they behead innocent Girls/kids for little Mistakes? why they (Indian Muslims) are demanding for Sharia law (why they say & bark like dogs that Stop Worship in temples, we'll behead all Hindus)?
even in that nation where Hindus are totally (.5) or 0.009% there also they (Muslims are killing) if there is also BJP/RSS ?
& Only hindus are not problem. the problem is that "Muslims/Traitors" can't be silent ...they like only blood...blood and blood, totally morons.
so Nobody has right to say anything bad about BJP/RSS (RSS is an army without salary and without weapons) they are totally spiritual about GOD, and they help in every tregedy (national Disasters with totally dedication) then how people can blame them only for (speaking the truth)? that they are Saffron terrorists? if They are "Terrorists" then "Taliban" will also Runaway with Their Black BurQa"... But always teasing the "Sleeping Lions is not good for health"...
but Muslims are Happy in (Non Islamic Nations only).. it's da fact. but Still they abuse the motherland...and bark like dogs.
I'm not Talking about (N@tionalist Muslim who are Like Dr. A.P.J Abdul Kalaam, A.R.Rahmaan, Shaheed Veer abdul hameed, Shaheed Ashfaq Ullah khan) but It's d truth. If you (N@TIONALIST Muslims love N@tion, then Support that person who'll save this Nation. I'm not saying that "Na.Mo" or any leader will go to fight on border. but Narendra Modi, is the LAst option Till now...
मत लड़ो आपस में ए हिन्दूऔं नहीं तो बिखर जाओगे |
मौत आने से पहले ही खुद की नज़रों में मर जाओगे ||
हो हिन्दू तो मिसाल बन कर उभरो दुनिया के लिए|
नहीं तो इतिहास के चंद पन्नो में सिमट के रह जाओगे ||
बिखराव या अलगाव तुम्हारा लक्ष्य ना हो |
मिलकर रहो दुनिया में तुम ही तुम नज़र आओगे ||
गुमान है उस १४०० सालो के भीषण संघर्ष का अगर|
बना लो आग खुद को नहीं तो राख में बदल दिए जाओगे ||
गर सबक नहीं लिया तुमने टूटे हुए मंदिरों से कटी हुयी गर्दनो से |
वो दिन बहुत दूर नहीं जब इसाई या मुसलमान बना दिए जाओगे ||
नफरत नहीं फैलाता इतिहास से सबक लेने को कहता हूँ |
तुम अगर गाँधी बने तो हम भी अब गोडसे बन जायेगे ||
दोस्तो हमारे भारत मे ऐसे कई नेता हैं जो गाय का मांस बेच कर अपना धंधा चला रहे हैं ! और भारत मे जो 3600 क्त्लखाने (registered) चल रहे हैं उनमे से 50 से 60 % इन्ही राजनेताओ के हैं ! जिनकी पूंजी से ये काम चल रहा है !
और जब भी संसद मे गौ ह्त्या को रोकने का विषय आता तो ये चिला -चिला कर खड़े हो जाते है कहते हैं गौ ह्त्या रुकनी नहीं चाहिए ! और उसके विचित्र विचित्र कुतर्क करते हैं ! उनमे से एक नेता शरद पवार जो कृषि मंत्री है उसने एक दिन कुतर्क किया कि गाय की ह्त्या अगर हमने रोक दी तो गाय की संख्या इतनी बढ़ जाएगी उसे हमे रखेंगे कहाँ ????????
ये बयान शरद पवार ने दिया !और मुंबई मे दिया ! और प्रेस कान्फ्रेंस मे दिया ! सौभाग्य की बात थी श्री राजीव दीक्षित जी उस दिन मुंबई मे थे और उस press कान्फ्रेंस मे थे ! अगले दिन राजीव भाई वो बयान की copy लेकर चले गए शरद पवार से मिलने !!
राजीव भाई ने पवार से कहा कि आपने बयान दिया है कि अगर गाय को हमने बचा लिया तो इनकी संख्या इतनी बढ़ जाएगी इन्हे रखेंगे कहाँ ?
श्री राजीव भाई ने कहा आप क्यूँ परेशान है ? आपके घर मे रखने नहीं आ रहे हम ! इतना तो पक्का है
और अगर आपकी बुद्धि इतना की काम करती है कि गाय को बचाने से उसकी संख्या बढ़ जाएगी तो ये तर्क मनुष्य पर भी लागू होना चाहिए ! सीधे सीधे से लागू होता है कि मनुष्यो को क्यूँ बचाया जाये ??? इनकी संख्या बढ़ जाएगी ! तो इसका मतलब मनुष्य की संख्या कम करने के लिए कत्ल करवाईये इनका !!
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फिर पवार ने कहा चारा कहाँ से लाएँगे ????
तो राजीव भाई ने कहा भगवान ने इस देश मे व्यवस्था ऐसी की है आप क्यूँ परेशान हैं उसके लिए ???
भगवान की वयवस्था मे आप क्यूँ दखलअंदाजी कर रहे हैं ???
भगवान मे इस देश मे जितनी भी फसल दी है जितनी भी फसलों के बीज दिये हैं ! 1400 किसम की फसले भारत मे होती हैं (गेहूं ,चावल ,जवारी ,उरद ,मूंग आदि आदि ! हरेक फसल के तीन हिस्से है !हरेक पोधे के तीन हिस्से है ऊपर का एक हिस्सा है वो मनुष्यो के लिए है पक्षियो के लिए है !
बीच का एक हिस्सा है वो पशुओ के लिए हैं ! और अंत का जो जड़ वाला हिस्सा है वो धरती माता के लिए है !
प्रकर्ति की बनाई हुई व्यवस्था है इसमे आप क्यूँ परेशान है ????
हिंदुस्तान मे 77 कोटी किसान खेती करते हैं और इनमे से लगभग 60 कोटी किसान ज्वारी पैदा करते हैं ! ज्वारी का बहुत थोड़ा सा हिस्सा मनुष्य के काम आता है ! ज्वारी का पूरा पेड़ आप गिने तो मुश्किल से उसका 10 % हिस्सा मनुष्य के काम आता है ! और बाकी नीचे का 80 से 90 % हिस्सा वो गाय के काम है बैल के काम का है ! भैंस के काम है पशु के काम का है !
तो चारे की कमी कहाँ से आई ????????????
गेहूं की फसल को देख लो ! गेहूं की फसल का 10 % हिस्सा मनुष्य के काम का है बाकी 70 से 85 % गाय के काम है अन्य पशुओ के काम है !
तो चारे की समस्या कहाँ से आई ??????????
गेहूं पैदा हो रहा है ज्वारी पैदा हो रही है ! चावल की फसल का बहुत छोटा सा हिस्सा मनुष्य के काम का है बाकी पशुओ के काम का है
तो चारे की कहाँ कमी है इस देश मे ???
आप क्यू परेशान हैं ????
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फिर पवार का तीसरा कुतर्क !
गाय बूढ़ी हो जाती है तो क्यूँ पालणा ?????
तो राजीव भाई ने कहा हमारी माता भी बूढ़ी हो जाती है उसको क्यूँ पालणा ?????
पवार ने कहा ! माता अलग है गाय अलग है !
राजीव भाई ने कहा मेरे लिए माता और गाय दोनों एक जैसी है ! क्यूंकि बचपन से हमने यही सुना है गाय हमारी माता है ! देश धर्म का नाता है !! तो मेरे लिए माता और गाय दोनों एक सी है !
तो गाय बूढ़ी हो गई इसलिए कत्ल होनी चाहिए तो माता भी बूढ़ी हो गई इस लिए कत्ल होनी चाहिए !
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फिर पवार का आखिरी कुतर्क !!
कि दूध नही देती है तो फोकट मे क्यूँ खिलाने का उसको ???????
तो राजीव भाई ने कहा दूध तो थोड़े दिन के बाद हमारी माता भी नहीं देती है ! हमारी माता तो हमे ज्यादा से ज्यादा 1 साल दूध पिलाती है और ये गौ माता तो जीवन पर्यंत हमको दूध पिलाती है ! इसका स्थान माता से भी ऊंचा है !
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फिर पवार का पूरा दिमाग घूम गया और बोला आपसे बात करना बेकार है !
तो राजीव भाई ने कहा मुझे भी आपसे बात करना बेकार है !
जिस आदमी को इतना नहीं समझता कि गाय को भारत मे घास चारे की कमी नहीं है और बूढ़ी होने पर काट देनी चाहिए ये तो बहुत खतरनाक मानसिकता है ! इससे अच्छे तो अंग्रेज़ थे जो खुलकर कहते थे कि हम तो गाय को काटते है अपने भोजन के लिए !!
लेकिन ये काले अंग्रेज़ तो उनसे भी ज्यादा खतरनाक है जो भारतीयता का लबादा ओढ़े हुये हैं और दिमाग मे पूरी अंग्रेज़ियत भारी हुई है !!
जरा गौर कीजिए और शेयर कीजिए -
1. आप पार्टी कभी ‪#‎समाजवादीपार्ट्री‬ के खिलाफ नहीं बोलती...
2. आप पार्टी कभी ‪#‎मायावतीके‬ खिलाफ नहीं बोलती...
3. आप पार्टी कभी ‪#‎लालू‬ यादवके विरुद्ध नहीं बोलती...
4. आप पार्टी कभी ‪#‎जेडीयूके‬ विरुद्ध नहीं बोलती...
5. आप पार्टी कभी ‪#‎नेशनल_कांफ्रेंस‬ के विरुद्ध नहीं बोलती...
6. आप पार्टी कभी ‪#‎ममता_बनर्जीके‬ विरुद्ध नहीं बोलती...
7. आप पार्टी कभी ‪#‎कम्युनिस्टके‬ खिलाफ नहीं बोलती...
8. आप पार्टी कभी ‪#‎करुणानिधि‬ और जय ललित के खिलाफ नहीं बोलती...
9. आप पार्टी कभी ‪#‎मुस्लिम_लीग‬ के विरुद्ध नहीं बोलती...
10. आप पार्टी कभी ‪#‎बंगलादेशी‬ घुसपैठ के विरुद्ध नहीं बोलती...
11. आप पार्टी कभी ‪#‎आतंकवादियों‬ के खिलाफ नहीं बोलती...
12. आप पार्टी कभी ‪#‎नक्सलवाद‬ और माओवाद के खिलाफ नहीं बोलती...
‪#‎आप‬ पार्टी जब भी बोलती है, ‪#‎कांग्रेस‬ की भाषा बोलती है, और केवल ‪#‎बीजेपी‬ के खिलाफ ही बोलती है...!!!

Saturday, May 2, 2015

इस्लाम पूर्व तुर्क और मंगोल समूहों द्वारा पूज्य गणेश प्रतिमा.

इस्लाम पूर्व तुर्क और मंगोल समूहों द्वारा पूज्य गणेश प्रतिमा.......saffron
विशेष सुचना: वाचको से विनती है की लेख माला से जुड़े चित्र अवश्य खोल के देखे! मैं अपने मित्र विक्रमादित्य दलवी जी का बहुत ही आभार प्रकट करना चाहता हु जिन्होंने हमारे सामने ये अभूतपूर्व जानकारी सामने रखी, | ये तो केवल सनातन धर्म है जो लेता भी है और देता भी है, , ये जानकारी मैं आप सभी के सामने रख रहा हु,



अधिकांश भारत वासीयो का मानना है की मुघलो ने भारत पर १००० वर्ष राज किया! ये धारणा सर्वता असत्य है, जो की नेहरु-गाँधी शासन काल में बड़ी चतुराई से फैलाई गई!  ये सत्य क्यों नहीं? ऐसा आप प्रश्न करेंगे! ये इसलिए क्यों की १००० वर्ष पूर्व मुघल मुस्लिम नही थे! इतना ही नही किन्तु, आज से १४०० वर्ष पहले सारे पृथ्वी पर मुस्लिम नामक कोई प्राणी ही नहीं था! इस्लाम की स्थापन अरब भूमी में हुई!
आज हम इतिहास के उन पन्नों को पलट कर ऐसी ही एक अमुस्लिम (Non Muslim) राष्ट्र का इतिहास देखेंगे जो आज पूर्णतहा लुप्त हो चूका है! ……………..
इस रोमहर्षक इतिहास का पन्ना हम आज खोल रहे है! इस लिए वाचको से विनती है की इसे ध्यान से पढे!
तुर्क और मंगोल (मुघल) लोगों का इस्लाम्पुर्व इतिहास!
खान यह नाम अमुस्लिम (Non Muslim) है!
आप में से अधिकांश लोगों चौक जाएँगे ये सुनकर की ‘खान’ यह नाम अमुस्लिम (Non Muslim) है! ‘खान’ यह तुर्क-मंगोल नाम इस्लाम पूर्व से ही प्रचलित है! आज भी मंगोलिया (भारत में उसे ‘मुघलिया’ के भ्रष्ट नाम से जानते है) एक बुद्ध धर्म को मानाने वाला राष्ट्र है! यहा पर कोई भी मुस्लिम नही है! आज भी चीन, जापान, कोरिया और मंगोलिया में खान नाम पाया जाता है! उदाहरण जापान के प्रधान मंत्री का ही ले लीजिए, जिनका नाम ‘नाओटो कान’ http://en.wikipedia.org/wiki/Naoto_Kan (जो खान शब्द का जापानी अपभ्रंश है) ये बुद्ध धर्मिय है! चीन का एक मंगोल राजा था जिसका नाम था कुबलाई खान (http://en.wikipedia.org/wiki/Kublai_Khan) जो बुद्ध/वेदिक धर्म का अनुयायी था! कुबलाई खान के एक शिला लेख में ‘ओम नमो भगवते’ इस घोष के अक्षर पाए गए है!
चेंगिज खान – वो वीर था जिसने इस्लाम को लग भग समाप्त कर दिया था! चेंगिज खान और उसकी मंगोल सेना (मुघल सेना) ऐसे अमुस्लिम थे जिन्होंने पहली बार मुस्लिम भूमि में घुस कर खलीफा अल मुस्तासिम बगदाद में घुसकर मारा! इतिहास बताता है की अरब और फारसी मुस्लिमो ने लगातार २५० वर्ष (१०५० से १२५८) मध्य एशिया पर जिहादी आक्रमण करके तुर्क और मंगोल समूहों को छल-बल से मुस्लिम बनाने के लिए उन पर घोर अत्याचार किये (ठीक वैसे ही जैसे मुस्लिम बनाये जाने पर इन मुघल और तुर्को ने भारत और हिन्दुओ पर किये उन्हें मुस्लिम बनाने के लिए)! इस लगातार मुस्लिम के विरोध में मंगोलों ने चेंगिज खान के नितृत्व में एक महा भयंकर प्रति आक्रमण मुस्लिम जगत पर किये! जिस में मंगोल सेना ने ५,०००,०००० मुस्लिमो की कत्तल की! बगदाद की भव्य मस्जिदों को मुघलो ने ध्वस्त कर दिया और कुरान को घोड़े की टाप के नीचे मसल दिया!
मंगोल विजेता चेंगिज खान उर्फ तिमुजिनी की समाधी
ये चेंगिज खान की मूल समाधी है! जो चीन और मंगोलिया के सीमा पर स्थित है! मंगोल और तुर्क उनके इस्लाम पूर्व काल में इंद्र, सूर्य, चंद्र तथा शिव के उपासक थे इस लिए इस समधी पर त्रिशूल हम देस्ख सकते है! इतना ही नहीं मंगोलिया आज भी बुद्ध पंथ को मानता है और वह कोई भी मुस्लिम नही है!
मंगोलिया के दिनों के नाम सारे संस्कृत प्राचुर है जैसे अंगारक अर्थात मंगलवार इत्यादि..
यह गणेश प्रतिमा तुर्क-मंगोल लोक समूहों द्वारा उन्हें बल पूर्वक मुस्लिम बनाये जाने से पहेले पूजी जाती थी!
इस गणेश जी की प्रतिमा को आप मंगोलिया की राजधानी “उलन बतोर” के संग्रहालय में देख सकते है!
इस्लाम पूर्व तुर्क उनके चाँद-तारे के झंडे को लहराते हुए! चाँद-तारा यह तेंग्री का प्रतिक है उसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है!
इस्लाम पूर्व तुर्क –मंगोल ये तेंग्री के उपासक थे! इस लिए उनके ध्वज पर चाँद-तारा अंकित किया था! यह चाँद-तारा वास्तव में तेंग्री का प्रतिक है और इसका इस्लाम से कोई संबंध नही है, किन्तु आज लोग तुर्क और मुघलो को मुस्लिम समझते है और कई मुस्लिम देशो ने अपने लिए चाँद-तारे के झंडे का चयन (चुनाव) किया जैसे की पाकिस्तान!
यह पर ध्यान देने की विशष बात ये है की आप को किसी भी अरब देशो में चाँद-तारे का झंडा कभी नही मिलेगा! चुकी इस्लाम यह अरबो का मजहब है इस से और एक बार यह सिद्ध हो जाता है की चाँद-तारे वाला झंडा अमुस्लिम (Non Mumslim) है!
तुर्क-मंगोल युद्ध देवता के रूप में श्री. गणेश
साभार: उलन बातुन संग्रहालय मंगोलिया
और एक महत्वपूर्ण बात हमे ध्यान में रखनी चाहिए की आज तक किसी भी अरब के नाम में आप को खान नहीं मिलेगा! आप में से जो लोग अरब देशो की यात्रा कर चुके है वो इस सत्य को तुरंत समझ जाएँगे! क्योकि जब कोई इस्लाम को स्वीकारता है तब उसे अपने पूर्वजो का स्वदेशी नाम त्याग कर अरबी नाम धारण करना पड़ता है! अरबी नाम!!! जैसे की महमद, इब्राहीम, अब्दुल्ला, ओमर, उसमान और वो सारे नाम जिसे आप मुस्लिम नाम कहते है, वे वास्तव में सब अरब नाम है!
फिर खान ये नाम मुस्लिमो में कैसे आया?
यह एक रोचक (Interesting) प्रश्न है! इस्लाम में आने पर व्यक्ति को अरब नाम धारण करना पड़ता है, यह इस्लाम का आदेश है! किन्तु १ दिन में २ लाख मुघलो को मुस्लिम बनाया गया! इतनी बड़ी सख्या के चलते उनके नाम पूर्ण रूप से अरबी न बन सके!
ये ठीक वैसा ही है जैसे……..
जाकिर नाईक (ये मुंबई में इस्लाम का प्रचारक है)
महमद चौधरी (पाकिस्तान का सांसद)
रशीद राठौर (लश्कर ए तोईबा के कश्मीर क्षेत्र का प्रमुख)
मेजर राणा आफताब आलम चौहान (पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था ISI का उच्च पदस्थ अधिकारी)
इस्लाम पूर्व तुर्क, ये मध्य एशिया पर अपनी अलग अलग टोलियो में रह कर राज करते थे! वैदिक काल में मध्य आशिय के पामीर पर्वत का उलेख मेरु पर्वत के नाम से किया है! महाभारत के वीर कुरु वंश की सीमा जहा तक थी, वह भी मध्य आशिय के तुर्कमेनिस्तान का प्रदेश है! जिसे महाभारतीय काल में “उत्तर कुरु” कहा जाता था! उस मध्य एशिया में इस्लाम का प्रवेश होने से पहले वैदिक संस्कृती थी! उनके नामो में संस्कृत शब्द “स्थान” इसका जीता जगता उदहारण है! जैसे की तुर्कमेनिस्तान, उझबेकिस्तान, ताजिकिस्तान इत्यादि! इन तुर्को में अलग अलग टोलिया थी! हुण, बुलगर, उघिर, क्वरलाँक और सेल्जुक ये कुछ तुर्को की बड़ी टोलिया थी! ये सब तुर्क टोलिया रंग, वंश में भिन्न थी किन्तु तुर्की भाषा के समान धागे में एक राष्ट्र के भाती बन्धी थी! तुर्क और मंगोल पहचाने जाते थे वो उनकी छोटी आँखों से जिन्हें मंगोल नेत्र भी कहते है! जैसे चीनी और जापानीयो समान छोटी आंखे और चपटी नाक! दिखने में लाल और गौर वर्ण की त्वचा वाले मंगोल और तुर्क अन्य जातियों से भिन्न थे! हिमालय के पार रहने वाले तुर्क और मंगोल ठण्ड से रक्षा करने के लिए चरणों में भालू की खाल के जूते पहनते थे!
इस्लाम पूर्व तुर्क और मंगोल ये वैदिक सभ्यता और बुद्ध भगवन के उपासक थे! इसके अतिरिक्त वे आकाश और ग्रह, नक्षत्रो के भी उपासक थे! तुर्क और मंगोलों में एक शक्तिशाली देवता थी, जो धरनी माँ और आकाश की स्वामी थी! इस देवता का उलेख वे तेंग्री के नाम से करते थे! एक आधा चंद्र और चांदनी ये तेंग्री का प्रतिक माना जाता था! यहा ध्यान देने की बात है की धरती माता की वैदिक सकल्पना इस बात का जीता जगता प्रमाण है की मध्य एशिया में वैदिक संस्कृती थी!
चाँद तारे का झंडा इस्लाम पूर्व तुर्को-मंगोलों का ध्वज है, उसका इस्लाम से कोई संबंध नही!
तुर्क-मंगोल यह तेंग्री के उपासक थे! तेंग्री का चिन्ह है चाँद-तारा! तेंग्री (तन + ग्रह) का अर्थ आकाश पिता (तेंग्री/तेंगर इस्तेग) और धरणी माता (इझे/गझर ऐझ! इतिहास बताता है की मंगोल विजेता चेंगिज खान अपने आदेशपत्र पर सबसे पहले तेग्री की शपथ ले कर विषय आरंभ करता था!
इस ग्रह-तारो से संबंधित तेंग्री की उपासना के कारण तुर्क-मंगोलों के झंडे में चाँद-तारे का चिन्ह था! आज बहुत से मुस्लिम राष्ट्रों ने अपने झंडे में चाँद-तारे को डाला है! जैसे की पाकिस्तान! पर हमें ध्यान देना चाहिए की चाँद-तारा तेंग्री का प्रतिक है और उसका इस्लाम से कोई लेना देना नही है! आज भी इस्लाम के मूलभुत अरब जगत में किसी भी अरब देश के झण्डे में चाँद-तारा नहीं है! आप स्वय अरब ध्वजो के इस चित्र को ऊपर देख सकते है! इस से ये स्पष्ट हो जाता है की चाँद-तारे का झंडा अमुस्लिम ‘तेंग्री’ का प्रतिक है इस्लाम का नही! सबसे महत्वपूर्ण बात तो ये है की आज भी तुर्की भाषा में इश्वर के लिए ‘तेंग्री’ शब्द का उपयोग किया जाता है!
जब हम इतिहास की गहराई में झाक के देखते है, तो तुर्क हो या मुघल इन में से कोई भी मुस्लिम नहीं था, किन्तु ये स्वय इस्लाम के कट्टर शत्रु थे! जिन्होंने जिहाद से अपने आप को बचाने के लिए अरब मुस्लिमो के साथ रक्त रंजित युद्ध लढे!
मंगोल विजेता चेंगिज खान की समाधी का प्रवेश द्वार
यह प्रवेशद्वार चेंगिज खान की समाधी का है! जो आज के एजीन होरो नामक चीनी नगर में स्थित है! http://en.wikipedia.org/wiki/Ejen_Khoruu_Banner हमें ध्यान देना चाहिए की मंगोल और तुर्क छल-बल पूर्वक मुस्लिम बनाये जानेसे पहले वैदिक सभ्यता को मानने वाले थे इसका सबसे बड़ा प्रमाण इस प्रवेशद्वार पर स्थित त्रिशूल से मिलता है!
चीनी और मंगोल उर्फ मुघलो की उपास्य देवत के रूप दुर्गा माता
तुर्क और मुघल छल बल से मुस्लिम बनाये जाने से पहले वैदिक पारंपर को मानने वाले थे! उनके द्वारा उपासना किये जाने वाली इस दुर्गा माता की प्रतिकृति को आप उलन बतुर के संग्रहालय में देख सकते है!
दुर्गा माता की एसी प्रतिकृति को आज भी चीन, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान और मंगोलिया के अनेक भागो में पूजा जाता है!
.............................................saffron...

Wednesday, April 29, 2015

महान योद्धा और हिंदू धर्म के संरक्षक बाजीराव पेशवा



विश्व इतिहास, कई सारी महान सभ्यताओं के उत्थान और पतन का गवाह रहा है। अपने दीर्घकालीन इतिहास में हिंदू सभ्यता ने दूसरों द्वारा अपने को नष्ट करने के लिए किये गये विभिन्न आक्रमणों और प्रयासों को सहा है। यद्यपि इसके चलते इसने वीरों और योद्धाओं की एक लंबी शृंखला उत्पन्न की है, जो आक्रान्ताओं से अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए समय-समय पर उठ खड़े हुए हैं। भारत के इतिहास में एक ऐसे ही महान योद्धा और हिंदू धर्म के संरक्षक के रूप में प्रख्यात नाम है- 18वीं शताब्दी में उत्पन्न बाजीराव पेशवा। अपने अद्वितीय पराक्रम द्वारा ‘राव के नाम से सभी को डराने वाले’ ऐसी धाक निर्माण करनेवाले, बीस वर्ष की कार्यकाल में धुआंधार पराक्रम के नए–नए अध्याय रचने वाले, विविध अभियानों में लगभग पौने दो लाख किलोमीटर की घुडदौड करने वाले, ‘देवदत्त सेनानी’ ऐसी लोकप्रियता प्राप्त करने वाले, तथा मराठा साम्राज्य की धाक संपूर्ण हिंदुस्थान पर निर्माण करने वाले इन्हीं ज्येष्ठ बाजीराव पेशवाजी का 28 अप्रैल को निर्वाण दिवस है।

जैसा कि हम जानते हैं कि विजयनगर राज्य के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा व्यवस्थित तरीके से स्थापित हिंदू पद पादशाही के अंतर्गत एक नवीन हिंदू राज्य का पुनर्जन्म किया गया, जिसने पेशवाओं के समय में एक व्यापक आकार ले लिया। इसी "पेशवा" पद को एक नई उँचाई तक ले जाने वाले कोंकण क्षेत्र के प्रतिष्ठित और पारंपरिक चितपावन ब्राह्मण परिवार के बालाजी विश्वनाथ राव के सबसे बड़े पुत्र के रूप में बाजीराव का जन्म 18 अगस्त 1700 ई. को हुआ था। बालाजी विश्वनाथ (बाजीराव के पिता) यद्यपि पेशवाओं में तीसरे थे लेकिन जहाँ तक उपलब्धियों की बात है, वे अपने पूर्ववर्तियों से काफी आगे निकल गये थे।
इस प्रकार बाजीराव जन्म से ही समृद्ध विरासत वाले थे। बाजीराव को उन मराठा अश्वारोही सेना के सेनापतियों द्वारा भली प्रकार प्रशिक्षित किया गया था, जिन्हें 27 वर्ष के युद्ध का अनुभव था। माता की अनुपस्थिति में किशोर बाजीराव के लिए उनके पिता ही सबसे निकट थे, जिन्हें राजनीति का चलता-फिरता विद्यालय कहा जाता था। अपनी किशोरावस्था में भी बाजीराव ने शायद ही अपने पिता के किसी सैन्य अभियान को नजदीक से न देखा हो जिसके चलते बाजीराव को सैन्य विज्ञान में परिपक्वता हासिल हो गई। बाजीराव के जीवन में पिता बालाजी की भूमिका वैसी ही थी, जैसी छत्रपति शिवाजी के जीवन में माता जीजाबाई की। 1716 में जब महाराजा शाहू जी के सेनाध्यक्ष दाभाजी थोराट ने छलपूर्वक पेशवा बालाजी को गिरफ्तार कर लिया, तब बाजीराव ने अपने गिरफ्तार पिता का ही साथ चुना, जब तक कि वह कारागार से मुक्त न हो गए। बाजीराव ने अपने पिता के कारावास की अवधि के दौरान दी गई सभी यातनाओं को अपने ऊपर भी झेला और दाभाजी के छल से दो-चार होकर नितांत नए अनुभव प्राप्त किये।
कारावास के बाद के अपने जीवन में बालाजी विश्वनाथ ने मराठा-मुगल संबंधों के इतिहास में नया आयाम स्थापित किया। किशोर बाजीराव उन सभी विकासों के चश्मदीद गवाह थे। 1718 ई. में उन्होंने अपने पिता के साथ दिल्ली की यात्रा की जहाँ उनका सामना अकल्पनीय षडयंत्रों से हुआ, जिसने उन्हें शीघ्र ही राजनीतिक साजिशों के कुटिल रास्ते पर चलना सीखा दिया। यह और अन्य दूसरे अनुभवों ने उनकी युवा ऊर्जा, दूरदृष्टि और कौशल को निखारने में अत्यन्त सहायता की, जिसके चलते उन्होंने उस स्थान को पाया जिसपर वह पहुँचना चाहते थे। वह एक स्वाभाविक नेता थे, जो अपना उदाहरण स्वयं स्थापित करने में विश्वास रखते थे। युद्ध क्षेत्र में घोड़े को दौड़ाते हुए मराठों के अत्यधिक वर्तुलाकार दंडपट्ट तलवार का प्रयोग करते हुए अपने कौशल द्वारा अपनी सेना को प्रेरित करते थे।
वो 2 अप्रैल 1719 का दिन था, जब पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने अपनी अंतिम साँसे ली। ऐसे में सतारा शाही दरबार में एकत्रित विभिन्न मराठा शक्तियों के जेहन में केवल एक ही प्रश्न बार-बार आ रहा था कि क्या दिवंगत पेशवा का मात्र १९ वर्षीय गैर-अनुभवी पुत्र बाजीराव इस सर्वोच्च पद को सँभाल पाएगा? वहाँ इस बात को लेकर आलोचना-प्रत्यालोचनाओं का दौर चल रहा था कि क्या इतने अल्प वयस्क किशोर को यह पद दिया जा सकता है? ऐसे में मानवीय गुणों की परख के महान जौहरी महाराजा शाहू ने इस प्रश्न का उत्तर देने में तनिक भी देर नहीं लगाई और तुरंत ही बाजीराव को नया पेशवा नियुक्त करने की घोषणा कर दी जिसे शीघ्र ही एक शाही समारोह में परिवर्तित कर दिया गया।
17 अप्रैल 1719 को तलवारबाजी में दक्ष, निपुण घुड़सवार, सर्वोत्तम रणनीतिकार और नेता के रूप में प्रख्यात बाजीराव प्रथम ने मात्र बीस वर्ष की आयु में शाही औपचारिकताओं के साथ पेशवा का पद ग्रहण किया। उन्हें यह उच्च प्रतिष्ठित पद आनुवंशिक उत्तराधिकार या उनके स्वर्गीय पिता के द्वारा किये गये महान कार्यों के फलस्वरूप नहीं दिया गया, अपितु उनकी राजनैतिक दूरदर्शिता से युक्त दृढ़ मानसिक और शारीरिक संरचना के कारण सौपा गया। इसके बावजूद भी कुछ कुलीन जन और मंत्री थे, जो बाजीराव के खिलाफ अपने ईर्ष्या को छुपा नहीं पा रहे थे परन्तु बाजीराव ने राजा के निर्णय के औचित्य को गलत ठहराने का एक भी अवसर अपने विरोधियों को नहीं दिया, और इस प्रकार अपने विरोधियों का मुँह को बंद करने में वह सफल रहे।
बाजीराव का शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य या "हिंदू पद पादशाही" के उदात्त स्वप्न में अटूट विश्वास था और इस स्वप्न को मूर्त रूप देने हेतु अपने विचारों को छत्रपति शाहू के दरबार में रखने का उन्होंने निश्चय किया। उन्होंने मुग़ल साम्राज्य की कमज़ोर हो रही स्थिति का फ़ायदा उठाने के लिए शाहू महाराज को उत्साहित करने के लिए कहा कि - 'आइये हम इस पुराने वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें, शाखायें तो स्वयं ही गिर जायेंगी, हमारे प्रयत्नों से मराठा पताका कृष्णा नदी से अटक तक फहराने लगेगी।' इसके उत्तर में शाहू ने कहा था कि, 'निश्चित रूप से ही आप इसे हिमालय के पार गाड़ देगें, क्योंकि आप योग्य पिता के योग्य पुत्र हैं।'
छत्रपति शाहू ने धीरे धीरे राज-काज से अपने को क़रीब-क़रीब अलग कर लिया और मराठा साम्राज्य के प्रशासन का पूरा काम पेशवा बाजीराव पर सौंप दिया। उन्होंने वीर योद्धा पेशवा को अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ने की अनुमति दे दी और छत्रपति शिवाजी के स्वप्न को पूरा करने के लिए उन्हें हर मार्ग अपनाने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की। बाजीराव की महान सफलता में, उनके महाराज का उचित निर्णय और युद्ध की बाजी को अपने पक्ष में करने वाले उनके अनुभवी सैनिकों का बड़ा योगदान था। इस प्रकार उनके निरंतर के विजय अभियानों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मराठा सेना की वीरता का लोहा मनवा दिया जिससे शत्रु पक्ष मराठा सेना का नाम सुनते ही भय व आतंक से ग्रस्त हो जाता था।
बाजीराव का विजय अभियान सर्वप्रथम दक्कन के निजाम निजामुलमुल्क को परास्त कर आरम्भ हुआ जो मराठों के बीच मतभेद के द्वारा फूट पैदा कर रहा था। 7 मार्च, 1728 को पालखेड़ा के संघर्ष में निजाम को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा और ‘मुगी शिवगांव’ संधि के लिए बाध्य होना पड़ा जिसकी शर्ते कुछ इस प्रकार थीं-शाहू को चौथ तथा सरदेशमुखी देना, शम्भू की किसी तरह से सहायता न करना, जीते गये प्रदेशों को वापस करना एवं युद्ध के समय बन्दी बनाये गये लोगों को छोड़ देना आदि। 1731 में एक बार पुनः निज़ाम को परास्त कर उसके साथ की गयी एक सन्धि के द्वारा पेशवा को उत्तर भारत में अपनी शक्ति का प्रसार करने की छूट मिल गयी। बाजीराव प्रथम का अब महाराष्ट्र में कोई भी प्रतिद्वन्द्वी नहीं रह गया था और राजा शाहू का उनके ऊपर केवल नाम मात्र नियंत्रण था।
दक्कन के बाद गुजरात तथा मालवा जीतने के प्रयास में बाजीराव प्रथम को सफलता मिली तथा इन प्रान्तों में भी मराठों को चौथ एवं सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार प्राप्त हुआ। ‘बुन्देलखण्ड’ की विजय बाजीराव की सर्वाधिक महान विजय में से मानी जाती है। मुहम्मद खां वंगश, जो बुन्देला नरेश छत्रसाल को पूर्णतया समाप्त करना चाहता था, के प्रयत्नों पर बाजीराव प्रथम ने छत्रसाल के सहयोग से 1728 ई. में पानी फेर दिया और साथ ही मुगलों द्वारा छीने गये प्रदेशों को छत्रसाल को वापस करवाया। कृतज्ञ छत्रसाल ने पेशवा की शान में एक दरबार का आयोजन किया तथा काल्पी, सागर, झांसी और हद्यनगर पेशवा को निजी जागीर के रूप में भेंट किया।
बाजीराव लगातार बीस वर्षों तक उत्तर की तरफ बढ़ते रहे, प्रत्येक वर्ष उनकी दूरी दिल्ली से कम होती जाती थी और मुगल साम्राज्य के पतन का समय नजदीक आता जा रहा था। यह कहा जाता है कि मुगल बादशाह उनसे इस हद तक आतंकित हो गया था कि उसने बाजीराव से प्रत्यक्षतः मिलने से इंकार कर दिया था और उनकी उपस्थिति में बैठने से भी उसे डर लगता था। मथुरा से लेकर बनारस और सोमनाथ तक हिन्दुओं के पवित्र तीर्थयात्रा के मार्ग को उनके द्वारा शोषण, भय व उत्पीड़न से मुक्त करा दिया गया था। बाजीराव की राजनीतिक बुद्धिमता उनकी राजपूत नीति में निहित थी। वे राजपूत राज्यों और मुगल शासकों के पूर्व समर्थकों के साथ टकराव से बचते थे, और इस प्रकार उन्होंने मराठों और राजपूतों के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंधों को स्थापित करते हुए एक नये युग का सूत्रपात किया। उन राजपूत राज्यों में शामिल थे- बुंदी, आमेर, डूंगरगढ़, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर इत्यादि।
खतरनाक रूप से दिल्ली की ओर बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए सुल्तान ने एक बार फिर पराजित निजाम से सहायता की याचना की। बाजीराव ने फिर से उसे घेर लिया। इस कार्य ने दिल्ली दरबार में बाजीराव की ताकत का एक और अप्रतिम नमूना दिखा दिया। मुगल, पठान और मध्य एशियाई जैसे बादशाहों के महान योद्धा बाजीराव के द्वारा पराजित हुए। निजाम-उल-मुल्क, खान-ए-दुर्रान, मुहम्मद खान ये कुछ ऐसे योद्धाओं के नाम हैं, जो मराठों की वीरता के आगे धराशायी हो गये। बाजीराव की महान उपलब्धियों में भोपाल और पालखेड का युद्ध, पश्चिमी भारत में पुर्तगाली आक्रमणकारियों के ऊपर विजय इत्यादि शामिल हैं।
बाजीराव ने 41 से अधिक लड़ाइयाँ लड़ीं और उनमें से किसी में भी वह पराजित नहीं हुए। वह विश्व इतिहास के उन तीन सेनापतियों में शामिल हैं, जिसने एक भी युद्ध नहीं हारा। कई महान इतिहासकारों ने उनकी तुलना अक्सर नेपोलियन बोनापार्ट से की है। पालखेड का युद्ध उनकी नवोन्मेषी युद्ध रणनीतियों का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। कोई भी इस युद्ध के बारे में जानने के बाद उनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। भोपाल में निजाम के साथ उनका युद्ध उनकी कुशल युद्ध रणनीतियों और राजनीतिक दृष्टि की परिपक्वता का सर्वोत्तम नमूना माना जाता है। एक उत्कृष्ट सैन्य रणनीतिकार, एक जन्मजात नेता और बहादुर सैनिक होने के साथ ही बाजीराव, छत्रपति शिवाजी के स्वप्न को साकार करने वाले सच्चे पथ-प्रदर्शक थे।
मशहूर वॉर स्ट्रेटिजिस्ट आज भी अमरीकी सैनिकों को पेशवा बाजीराव द्वारा पालखेड में निजाम के खिलाफ लड़े गए युद्ध में मराठा फौज की अपनाई गयी युद्धनीति सिखाते हैं| ब्रिटेन के दिवंगत सेनाप्रमुख फील्ड मार्शल विसकाउंट मोंटगोमेरी जिन्होने प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मन्स के दाँत खट्टे किए थे, वे पेशवा बाजीराव से ख़ासे प्रभावित थे उनकी तारीफ वे अपनी किताब 'ए कन्साइस हिस्टरी ऑफ वॉरफेयर' में इन शब्दों में करते हैं -----The Palkhed Campaign of 1728 in which Baji Rao I out-generalled Nizam-ul-Mulk , is a masterpiece of strategic mobility -----British Field Marshall Bernard Law Montgomery, The Concise History of Warfare, 132
अप्रैल 1740 में, जब बाजीराव अपने जागीर के अंदर आने वाले मध्य प्रदेश के खरगौन के रावरखेडी नामक गाँव में अपनी सेना के साथ कूच करने की तैयारी कर रहे थे, तब वे गंभीर रूप से बीमार हो गये और अंततः नर्मदा के तीर पर 28 अप्रैल 1740 को उनका देहावसान हो गया। एक प्रख्यात अंग्रेज इतिहासकार सर रिचर्ड कारनैक टेंपल लिखते हैं, "उनकी मृत्यु वैसी ही हुई जैसा उनका जीवन था- तंबूओं वाले शिविर में अपने आदमियों के साथ। उन्हें आज भी मराठों के बीच लड़ाकू पेशवा और हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में याद किया जाता है।"
जब बाजीराव ने पेशवा का पद सँभाला था तब मराठों के राज्य की सीमा पश्चिमी भारत के क्षेत्रों तक ही सीमित थी। 1740 में, उनकी मृत्यु के समय यानि 20 वर्ष बाद में, मराठों ने पश्चिमी और मध्य भारत के एक विशाल हिस्से पर विजय प्राप्त कर लिया था और दक्षिण भारतीय प्रायद्वीप तक वे हावी हो गये थे। यद्यपि बाजीराव मराठों की भगवा पताका को हिमालय पर फहराने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर पाए, लेकिन उनके पुत्र रघुनाथ राव ने1757 ई. में अटक के किले पर भगवा ध्वज को फहराकर और सिंधु नदी को पार कर के अपने पिता को स्वप्न को साकार किया।
निरंतर बिना थके 20 वर्षों तक हिंदवी स्वराज्य स्थापित करने के कारण उन्हें (बाजीराव को) हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। उनके पुत्रों बालाजी उर्फ नाना साहेब, रघुनाथ, जनार्दन, उनकी मुस्लिम प्रेमिका मस्तानी से शमशेर बहादुर और छोटे भाई चिमाजी अप्पा के पुत्र सदाशिवराव भाऊ ने भगवा पताका को दिग-दिगंत में फहराने के उनके मिशन को जारी रखते हुए 1758 में उत्तर में अटक के किले पर विजय प्राप्त करते हुए अफगानिस्तान की सीमा को छू लिया, और उसी समय में भारत के दक्षिणी किनारे को भी जीत लिया। लोगों में स्वतंत्रता के प्रति उत्कट अभिलाषा की प्रेरणा द्वारा और आधुनिक समय में हिंदुओं को विजय का प्रतीक बनाने के द्वारा वे धर्म की रचनात्मक और विनाशकारी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे। पेशवा बाजीराव प्रथम अपने जीवन काल में महानायक के रूप में प्रख्यात थे और मृत्यु के बाद भी लोगों के मन उनकी यह छवि उसी प्रकार विद्यमान थी। उनकी उपस्थिति हिंदू जन मानस पर अमिट रूप से अंकित हो चुकी है और इसे समय के अंतराल द्वारा भी खंडित नहीं किया जा सकता।
बाजीराव के बारे में “History of the Marathas” में जे. ग्रांट डफ कहते हैं: "सैनिक और कूटनीतिज्ञ के रूप में लालित और पालित बाजीराव ने कोंकण के ब्राह्मणों को विशिष्ट बनाने वाली दूरदर्शिता और पटुता के माध्यम से शिष्ट तरीके से मराठा प्रमुख के साहस, जोश और वीरता को संगठित रूप दिया। अपने पिता की आर्थिक योजना से पूर्ण परिचित बाजीराव ने एक सामान्य प्रयास द्वारा महाराष्ट्र के विभिन्न जोशीले किन्तु निरुद्देश्य भटकने वाले समुदायों को संगठित करने के लिए उन योजनाओं के कुछ अंशों को प्रत्यक्ष रूप से अमली जामा पहनाया। इस दृष्टिकोण से, बाजीराव की बुद्धिमता ने अपने पिता की अभीप्सित योजनाओं का विस्तार किया; उनके बारे में यह सत्य ही कहा गया है- उनके पास योजना बनाने हेतु एक मस्तिष्क और उसे कार्यान्वित करने हेतु दो हाथ थे, ऐसी प्रतिभा विरले ही ब्राह्मणों में पायी जाती है।
“Oriental Experiences” में सर आर. टेम्पल कहते हैं: "बाजीराव एक उत्कृष्ट घुड़सवार होने के साथ ही (युद्ध क्षेत्र में) हमेशा कार्रवाई करने में अगुआ रहते थे। वे मुश्किल हालातों में सदा अपने को सबसे आगे कर दिया करते थे। वह श्रम के अभ्यस्त थे और अपने सैनिकों के समान कठोर परिश्रम करने में एवं उनकी कठिनाइयों को अपने साथा साझा करने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते थे। राजनैतिक क्षितिज पर बढ़ रहे उनके पुराने शत्रुओं मुसलमानों और नये शत्रुओं यूरोपीय लोगों के खिलाफ उनके अंदर राष्ट्रभक्तिपूर्ण विश्वास के द्वारा हिंदुओं से संबंधित विषयों को लेकर राष्ट्रीय कार्यक्रमों की सफलता हेतु एक ज्वाला धधक रही थी। अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मराठों के विस्तार को देखना ही उनके जीवन का ध्येय था। उनकी मृत्यु वैसी ही हुई जैसा उनका जीवन था- तंबूओं वाले शिविर में अपने आदमियों के साथ। उन्हें आज भी मराठों के बीच लड़ाकू पेशवा और हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में याद किया जाता है।
“Peshwa Bajirao I and Maratha Expansion” की प्रस्तुति में जदुनाथ सरकार कहते हैं: "बाजीराव दिव्य प्रतिभा संपन्न एक असाधारण घुड़सवार थे। पेशवाओं के दीर्घकालीन और विशिष्ट प्रभामंडल में अपनी अद्वितीय साहसी और मौलिक प्रतिभा और अनेकानेक अमूल्य उपलब्धियों के कारण बाजीराव बल्लाल का स्थान अतुलनीय था। वह एक राजा या क्रियारत मनुष्य के समान वस्तुतः अश्वारोही सेना के वीर थे। यदि सर राबर्ट वालपोल ने इंग्लैंड के अलिखित संविधान में प्रधानमंत्री के पद को सर्वोच्च महत्ता दिलाई तो बाजीराव ने ऐसा ही तत्कालीन समय के मराठा राज में पेशवा पद के लिए किया।"
यह बाजीराव ही थे जिन्होंने महाराष्ट्र से परे विंध्य के परे जाकर हिंदू साम्राज्य का विस्तार किया और जिसकी गूँज कई सौ वर्षों से भारत पर राज कर रहे मुगलों की राजधानी दिल्ली के कानों तक पहुँच गयी। हिंदू साम्राज्य का निर्माण इसके संस्थापक शिवाजी द्वारा किया, जिसे बाद में बाजीराव द्वारा विस्तारित किया गया, और जो उनकी मृत्यु के बाद उनके बीस वर्षीय पुत्र के शासन काल में चरम पर पहुँचा दिया गया। पंजाब से अफगानों को खदेड़ने के बाद उनके द्वारा भगवा पताका को न केवल अटक की दीवारों पर अपितु उससे कहीं आगे तक फहरा दिया गया। इस प्रकार बाजीराव का नाम भारत के इतिहास में हिंदू धर्म के एक महान योद्धा और सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक के रूप अंकित हो गया| उनके निर्वाण दिवस पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

Friday, April 10, 2015

दगाबाज नेहरु लम्पट नेहरु

भारत-चीन युद्ध: नेहरू-मेनन ने देश को छला, भारतीय महिलाओं को लूटा और वामपंथियों ने चीन का बाहें फैला कर स्‍वागत किया।‪#‎TheTruIndianHistory‬
संदीप देव। वामपंथी और कांग्रेसियों के खून में जो गद्दारी दिखती है, देश में उसका सबसे बेहतरीन उदाहरण सन 1962 में हुआ भारत-चीन युद्ध था, जिसमें नेहरू ने देश को छला और भारत की कम्‍यूनिस्‍ट पार्टियों ने चीन का बाहें फैलाकर स्‍वागत किया था।
अक्‍टूबर 1962 में चीनी सेना ने मैकमोहन रेखा पार कर भारत पर आक्रमण कर दिया था। भारतीय सेना युद्ध के लिए किसी भी तरह तैयार नहीं थी।, उसके अस्‍त्र-शस्‍त्र पुराने थे। उस समय रक्षा मंत्री कृष्‍णा मेनन थे। नेहरू सरकार ने उस वक्‍त इतना बड़ा घाेटाला किया था कि आप चौंक जाएंगे। कागज व नक्‍शे में चीन की सीमा तक सड़क का निर्माण दिखाया गया था, सड़क निर्माण का फंड भी गायब था, लेकिन जब सैनिक वहां पहुंचे तो पाया कि नक्‍शे में जहां सड़क दिखाई गई है, वहीं कभी सड़क बनी ही नहीं।
तो फिर सवाल उठता है कि सड़क निर्माण पर तो रकम खर्च की गई थी, उसे कौन डकार गया। आज तक 60 साल के शासन में किसी सरकार ने इसकी जांच क्‍यों नहीं कराई है। मेरी बातों पर भरोसा न तो तो आप अक्‍टूबर 1962 का अखबार उठा कर देख लीजिए। बनारस के नागरी प्रचारिणी सभा में 1928 से सारा अखबार मौजूद है। मैंने वहीं से इसे नोट किया है। आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि नेहरू सरकार के समय सेना की हालत बेहद खस्‍ताहाल थी। सरकार का कहना था कि सेना का क्‍या काम है। खाली समय में सेना टमाटर आदि की खेती करे तो ज्‍यादा उचित होगा।
चीन ने जब आक्रमण कर दिया तो नेहरू सरकार ने जनता को लूटने का मन बनाया और घोषणा की कि सेना के पास अस्‍त्र-शस्‍त्र नहीं है और न ही सरकार के बजट में इसे खरीदने के लिए धन है। माताएं-बहने घर से बाहर आएं और अपना-अपना जेवर युद्ध के लिए दान करें। जगजीवनराम जैसे बड़े कांग्रेसी नेता सभा कर कर महिलाओं से जेवर मांग रहे थे।
बनारस की उनकी सभा में जेवरों का ढेर लग गया था। उनके भीख मांगने पर भारत की महिलाओं ने खुल कर अपने आभूषणों का दान दिया, लेकिन आपको आश्‍चर्य होगा कि वह आभूषण भी कई जगह स्‍थानीय कांग्रेस कमेटी के सदस्‍यों ने डकार लिया। हल्‍के जेवरात तो सरकारी खजाने में जमा कराए गए और भारी-भारी आभूषण कांग्रेस कमेटी के सदस्‍यों ने अपनी बीबी और बहनों के लिए या फिर उसे बेच कर धन कमाने के लिए गायब कर दिया था।
अखबार की रिपोर्टिंग आप देखेंगे तो उस वक्‍त जनता में इसे लेकर गजब का आक्रोश था, लेकिन हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास की पुस्‍तकों में न इस घोटाले का और न ही उस जन आक्रोश का ठीक से वर्णन ही नहीं किया है। आपको आश्‍चर्य होगा कि कृष्‍णा मेनन रक्षा मंत्री थे, लेकिन कभी भारत-चीन सीमा पर वह गए ही नहीं थे।
अखबार मेनन को हटाने की मुहिम चला रहे थे, लेकिन लोग दूसरी बात कह रहे थे। लोग कह रहे थे, '' क्‍या नेहरू बच्‍चे थे जो मेनन के बहकावे में आ गए। वह देश के प्रधानमंत्री हैं और सारी जिम्‍मेवारी उनकी है। अपने मंत्रीमंडल के सदस्‍यों के काम का पता यदि प्रधानमंत्री नहीं रखेगा तो फिर ऐसे प्रधानमंत्री का क्‍या काम।'' जैसे-तैसे मेनन से इस्‍तीफा लिया गया ताकि नेहरू के प्रति बढ रहा जनआक्रोश कम किया जा सके। लोगों ने कहा, ''चलो मेनन की बली चढा कर नेहरू ने स्‍वयं को बचा लिया। नेहरू की गददी तो बच गई, पर देश बचे तब तो।''
दूसरी तरफ देशद्रोही वामपंथी थे। भारत की सभी कम्‍यूनिस्‍ट पार्टियां यह झूठा प्रचार करने में जुटी थी कि ''चीन ने हमारे देश पर आक्रमण नहीं किया है। वह अपनी ही जमीन पर आगे बढ़ रहा है। अंग्रेज अधिकारी मैकमोहन ने झूठी व काल्‍पनिक रेखा खींच कर चीन की जमीन भारत में मिला दी थी, जिसे चीन ले रहा है तो कौन सा गुनाह कर रहा है। चीन अपनी जमीन पर सेना का मूवमेंट कर रहा है। इससे देश को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।''
अखबार ने लिखा था, ''रुस्‍तम सटीन के नेतृत्‍व में कम्‍युनिस्‍टों का एक दल नक्‍शे लेकर बाजार में दुकान दुकान जनता को समझा रहा था कि चीन ने आक्रमण नहीं किया है। वह अपनी सीमा के भीतर सेनाओं को सक्रिय कर रहा है।चीन ने भारत पर आक्रमण नहीं किया है, बल्कि भारतीय सेना ही चीन के क्षेत्र में घुस गई है।'
कैंप पर जनता सैनिकों का उत्‍साहवर्धन करने के लिए जाती थी। जनता का आभार व्‍यक्‍त करते हुए मुगलसराय कैंप के एक कैप्‍टन ने कहा था, '' आपने यह माला किसी सैनिक के गले में नहीं, वरन एक जीवित शहीद के गले में डाली है। हम सब शहीद होने के लिए बॉर्डर पर जा रहे हैं। जब हमारे पास आधुनिक हथियार ही नहीं हो, जब नक्‍शे में सड़क हो और जमीन पर वह गायब हो तो ऐसे में हम क्‍या कर सकते हैं। हम तो उसे तलाशते ही रह जाते हैं और वह हमें घेर कर हम पर वार कर देता है। ऐसे में शहीद होने के अलावा हमारे पास कोई चारा ही नहीं है।' कैप्‍टन ने यहां तक कहा था, यह हमारी हताशा नहीं बोल रही है, बल्कि अपने नेताओं के कमीनेपन पर हमारा आक्रेश है। शायद आपको यह आक्रेश न हो क्‍योंकि आप लोग जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं।''
चीन ने बोमडिला तक का सारा क्षेत्र अपने कब्‍जें में ले लिाय और एक तरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी। बेशर्म नेहरू ने कहा, '' चीन ने जिस क्षेत्र पर कब्‍जा किया है, वह 'नो मैन लैंड' है। वह एकदम उजाड़ है।'' जनता ने जबरदस्‍त प्रतिक्रिया दी। जनता का बयान देखिए, '' नेहरू के हिसाब से तो भारत में बिना आदमी का घर और बिना पानी का नहर चीन जहां भी देखेगा हथिया लेगा, क्‍योंकि वह भी तो उसके लिए 'नो मैन लैंड' ही होगा।''
देशद्रोही कम्‍यूनिस्‍टों ने कहा, ''जीतने वाली सेना कभी एकरफ युद्ध विराम करती है, लेकिन चीन ने किया है। इसी से साबित होता है कि चीन हमलावर नहीं था, बल्कि वह अपनी जमीन लेने आया था, जो भारत के कब्‍जे में था।'' सोचिए कांग्रेस और कम्‍यूनिस्‍ट, आज यही दोनों देशद्रोही पार्टियां और इसकी विचारधारा के लोग हमें देशभक्ति सिखला रहे हैं, टीवी पर बैठकर प्रवचन दे रहे हैं।
आपको-हमको इतिहास की टेस्‍टबुक में इनकी घटिया कारास्‍तानी नहीं मिलेगी, क्‍योंकि एनसीईआरटी एवं अन्‍य टेक्‍सटबुक तो कांग्रेसी व वामपंथी चापलूस इतिहासरों ने लिखा है। लेकिन उस वक्‍त के सभी अखबार दस्‍तावेज है, जो आज भी देश के विभिन्‍न पुस्‍तकालयों में मौजूद हैं और जिन्‍हें हर हाल में पलट कर नए इतिहास को लिखने की जरूरत है। मैंने कुछ घटनाओं को तो नोट कर लिया था, लेकिन इसमें इतना श्रम, समय और पैसा चाहिए कि एक अकेला आदमी पूरी तरह से बिखर जाएगा। यह तो संगठित रूप से किया जाने वाला प्रयास है। देखते हैं यह कैसे होता है। मेरी PMO India Narendra Modi से अपील है कि वह देश के इतिहास के पुनर्लेखन को प्राथमिकता दें, क्‍योंकि हमारे बच्‍चे देशद्रोहियों को देशभक्‍त के रूप में पढ़ पढ़ कर गुमराह हो रहे हैं।

Tuesday, March 24, 2015

स्वदेशी अपनाओ, देश बचाओ

पेप्सी बोली सुन कोका कोला !
भारत का इन्सान है बहुत भोला।
:
विदेश से मैं आयी हूँ,
साथ में मौत को लायी हूँ ।
:
लहर नहीं ज़हर हूँ मैं,
गुर्दों पर गिरता कहर हूँ मैं ।
:
मेरी पी.एच. दो पॉइन्ट सात,
मुझ में गिरकर गल जायें दाँत ।
:
जिंक आर्सेनीक लेड हूँ मैं,
काटे आतों को, वो ब्लेड हूँ मैं ।
:
हाँ दूध मुझसे सस्ता है,
फिर पीकर मुझको क्यों मरना है ।
:
540 करोड़ कमाती हूँ,
विदेश में ले जाती हूँ ।
:
मैं पहुँची हूँ आज वहाँ पर,
पीने को नहीं पानी जहाँ पर ।
:
छोड़ो नकल अब अकल से जीयो,
और जो कुछ पीना संभल के ही पीयो ।
:
पेप्सी बोली सुन कोका कोला !
भारत का इन्सान है बहुत भोला।
:
विदेश से मैं आयी हूँ,
साथ में मौत को लायी हूँ ।
:
लहर नहीं ज़हर हूँ मैं,
गुर्दों पर गिरता कहर हूँ मैं ।
:
मेरी पी.एच. दो पॉइन्ट सात,
मुझ में गिरकर गल जायें दाँत ।
:
जिंक आर्सेनीक लेड हूँ मैं,
काटे आतों को, वो ब्लेड हूँ मैं ।
:
हाँ दूध मुझसे सस्ता है,
फिर पीकर मुझको क्यों मरना है ।
:
540 करोड़ कमाती हूँ,
विदेश में ले जाती हूँ ।
:
मैं पहुँची हूँ आज वहाँ पर,
पीने को नहीं पानी जहाँ पर ।
:
छोड़ो नकल अब अकल से जीयो,
और जो कुछ पीना संभल के ही पीयो ।
:
बच्चों को यह कविता सुनाओ,
स्वदेशी अपनाओ, देश बचाओ ।

-ठलुआ क्लब

Sunday, March 15, 2015

OPEN LETTER TO MR. UNNIKRISHNAN



OPEN LETTER TO MR. UNNIKRISHNAN 
Dear Mr. Unnikrishnan,
You do not know me but I owe you a great debt. It sits on my shoulder like the body of a much loved brother, it shrouds my heart and casts a pall on all that I do….I know not how to repay you and that is my biggest agony. I see you as you speak to the media without a quaver in your voice, I see your wife with a broken heart and I am lashed with a pain that has no voice. Your son died saving my son and it weighs me down…speak to me and ask for something in return…I will give you my blood and the very marrow from my bone! Forgive me as I am the cause of your brilliant son fading…I did not see the enemy neither did I recognize it and when it attacked me with the ferocity of a thousand lions, I could only run and try to hide. I left the battle to your son and he has gone to the soldier’s paradise. He has done his duty and asked for nothing and I am cursed.
I am cursed as I lie at night wrestling with sleep as images of the dead and dying call out to me. I am cursed when I see the beautiful face of your son. I am cursed when I look at the face of grief that is your wife. I look at my sleeping son lying safe in his bed and I am overwhelmed. I cannot begin to imagine what courage it takes you to get up in the morning and face another day.
If it gives you any small iota of relief, let me tell you that it is the sacrifice of soldiers like your son which make me hold up my head high. It ignites a feeling of great self esteem and it is what makes me hopeful. If we have men like your son still left in India , then we will come into our own. These men show me a bright, shining vision of the future and make me a believer.Our fat, ugly, disillusioned sorry caricatures who are our politicians who suck out hope and glory and tarnish all that is good in our world fail in their task of destroying our faith.Men like Major Sandeep who live by their ideals unflinchingly are our saviours. We see them and recognize in them a pure spirit burning bright. They are our beacons…they shine forth like our star of hope and we can weather all storms.
Mr. Unnikrishnan, you are the exceedingly brave father of a lion among men. In your grief, know this that all Indians have seen him and his faith and his love for our country…in his death he has become immortal.
Death will come to us all. It will carry us away leaving only our loved ones sorrowful…your son’s funeral has made a whole nation grief-stricken. It has made all Indians say a prayer for him and his family. It has made us sit up and has lit a fire under us. He singlehandedly silenced Mr. Raj Thackeray with his deed. This sorry politician’s career is over before it began…the so-called leader of the Marathi hides his face at home when a soldier rams home his point in so direct a fashion. Raj Thackeray was cowering beneath his bed when “his” Mumbai was burning and the men in uniform fought and gave up their lives for an India they unite and protect. No talk, no rhetoric just a heroic fight to the finish!
Mr. Unnikrishnan, if we have more men like your son then India WILL become a superpower.
I salute you and your family.
Godbless you all.
An indebted Indian.
Indian Army Fans

Monday, February 9, 2015

बजार में मिल रहे है खतरनाक अनुवांशिक संशोधित भोजन

बजार में मिल रहे है खतरनाक अनुवांशिक संशोधित भोजन !!

(भारत की जनता को मारने का प्लान)


क्या पूरी दुनिया में सिर्फ भारत के लोग ही मिले है एक्सपेरिमेंट करने के लिए लिए?? मित्रो, आज एक ऐसा मुद्दा उठा रहा हूँ जो भारत की जनता के स्वस्थ्य को तै करेगा |

जेनेटिक-मॉडिफाइड फसल हमारे देश में बेचने की पूरी साजिश रची जा चुकी है और MNC लॉबी यह कहकर देश की जनता को गुमराह कर रही है की इसके कोई भी नुक्सान नहीं है |

अगर इस फसल का कोई भी नुक्सान नहीं है तोह क्यूँ Europe में GM(Genetic Modify) खाद्य पदार्थ बंद है ? क्यूँ अमेरिका में बंद है ?

जेनेटिक मॉडिफाइड वो फल सब्जी या अनाज होता है जिका DNA बदल दिया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा फसल हो सके |

DNA वो पदार्थ होता है जो इंसान को इंसान बनता है और पशु को पशु . पशुओ और इंसानों में मुश्किल से 5% DNA का फर्क होता है |

आज हमें नहीं पता की DNA बदले जाने पर अनाज किस प्रकार का उगा है और लम्बे समय तक उसका मानव जाती पर क्या प्रभाव पड़ेगा | इसिलए यह सभी विदेशी लोग अपने लालच के चक्कर में सारा अनाज भारत को बेचने में लगे है और भारत की चोर लुटेरी कांग्रेस सरकार भी इनका साथ दे रही है |

अगर भारत में ऐसा ही चलता रहा तोह भविष्य में वो वक्त भी भारत देख सकता है जब पूरा देश बीमारियों से ग्रसित होगा और इलाज मिलने से पहले पूरे देश की जनता बिमारी के कारण सब कुछ खो दे अपने प्राण भी |

DNA के साथ खेलना प्रकृति का काम है इंसानों का नहीं | अगर इंसान प्रकृति के काम में ऊँगली करेगा तोह इसके परिणाम बहुत भयानक होंगे , इतने भयानक की इंसान कल्पना भी नहीं कर सकता

हमारे देश में 100% शुद्ध organic खेती करी जा सकती है
परन्तु हमारे देश की भ्रष्ट सरकार एसा होने नहीं देती। आप प्रश्न करेंगे क्यों? इसका जवाब बहुत ही सरल है। हमारे देश की सरकार कीटनाशक तथा ज़हरीले केमिकल्स बनाने वाली विदेशी कंपनियों से मोटा माल खाती है। लाखों करोड़ो का टैक्स तो वसूलती ही है सरकार साथ मे दो नंबरी का पैसा भी खाती है इन विदेशी कंपनियों से। यह भ्रष्ट मंत्री जो खुद 100% शुद्ध आर्गेनिक भोजन खाते हैं वे देश की करोड़ो जनता को ज़हरीला भोजन खाने पर मजबूर करते हैं तथा देश की जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ करते हैं।
जहाँ अमेरिका जैसे देश में सरकार द्वारा सीमा निर्धारितहोती है की फल और सब्जियों में कितनी मात्रा तक कीटनाशक तथा pesticides डालें जा सकते हैं वहीँ भारत में इस प्रकार की कोई सीमा निर्धारित नहीं करी गई है।जहाँ अमेरिका में 100% organic खेती करने वाले किसानो को अमेरिका की सरकार Subsidy देती हैं वहीँ भारत में किसानो को ज़हरीले chemicals और कीटनाशक प्रयोगकरने के लिए सरकार द्वारा किसानो को मजबूर किया जाता है।यह ज़हरीले chemicals हमारे खाद्य चक्र में घुस कर कैंसर , दमा , मानसिक रोग आदि पैदा करते हैं .
आखिर कैसे होती है organic खेती? क्या है यह organic खेती? किस प्रकार हमरी जान केसाथ खिलवाड़ हो रहा है? यह सब जान ने के लिए क्लिक करें -
http://www.youtube.com/watch?v=Onp9YZ8_GXM
http://www.youtube.com/watch?v=2qNDu28tbkY

क्यों राजीव दीक्षित जी को कभी भी मीडिया का समर्थन नहीं मिला?

Sunday, February 8, 2015

अमेरिका की संकीर्ण विदेश नीति

सीरिया और इराक की घृणित इस्लामी आतंकवाद और हिंसा के साथ भारत की सहिष्णुता को घसीटने के लिए ओबामा के मूर्खतापूर्ण टिप्पणी पर वाशिंगटन पोस्ट के स्तम्भकार ने ओबामा को गहरी लताड़ लगायी है. उन्होंने कहा की एसी कौन सी मुसीबत भारत में आन पड़ी है की वे सीरिया और इराक के साथ भारत को घसीट रहे हैं? यह साफ है की ओबामा भारत का अपमान कर रहे हैं और इसलिए की भारत एक हिंदू देश है. भारत धरती पर दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम देश है और इसके बाबजूद आप भारत के पीछे पड़ जाते हैं. आप यह बताना चाहते हैं की वहाँ का हर आदमी गलत कर रहा हैं. वे कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं. आपका भाषण तुच्छ और अप्रिय है.


इसी बिच खबर आ रही है मोदी ओबामा बोले तो भारत अमेरिका के अच्छे भले मजबूत होते रिश्ते के बिच दरार पैदा करने वाला कोई विदेशी ताकत नहीं बल्कि बरसों से हमारे प्यारे हिन्दुस्तान को तबाह और बर्बाद कर रही कैथोलिक इटालियन सोनिया ही थी. कैथोलिक सोनिया अपने गद्दार गैंग के साथ राष्ट्रपति ओबामा से जब मिली थी तभी उसने भारत में ईसाईयों के विरुद्ध हिंदुओं द्वारा किये जा रहे हिंसा, चर्च में तोड़फोड़, घर वापसी आदि शिकायतों का जहर उगला था जिसका प्रकटीकरण अगले दिन ओबामा के सीरी फोर्ट में दिए गए भाषण में हुआ था, हालाँकि, व्हाइट हाउस ने स्पष्टीकरण देते हुए इसे भारत के विरुद्ध नहीं बल्कि सबपर लागू होने वाला सामान्य बात कही थी, परन्तु परसों फिर ओबामा ने भारत में धार्मिक असहिष्णुता की बात कर यहाँ तक कह दिया की गाँधी होते तो बे शर्मिंदा होते. ये सेकुलर देशद्रोही अपने राजनितिक स्वार्थ और हिंदू विरोध के आलम में फिर से भारत को पुरे विश्व में बदनाम करने का षड्यंत्र कर रहे हैं. इसके पहले ये पुरे विश्व को यह जता चुके हैं की भारत में केवल एक ही धार्मिक स्थल टुटा है और वो है तथाकथित बाबरी मस्जिद और एक ही दंगा हुआ है और वो है मुस्लिमों के विरुद्ध गुजरात दंगा जबकि सच्चाई यह है की आजादी के बाद भी सैकड़ों मंदिर सिर्फ कश्मीर में ही तोड़ दिए गए हैं और हजारों दंगे आये दिन होते रहे हैं. दूसरी बात, मुझे लगता हैं दिल्ली में चर्च पर हमलों में कजरिया गैंग का हाथ नहीं ये गद्दार सोनिया और कांग्रेसियों का ही हाथ होगा ताकि वे हिंदुओं के विरुद्ध ईसाई ओबामा को भडका सकें. ज्ञातव्य हैं चर्च पर हमला करने वाले सभी ईसाई ही थे जो अब गिरफ्त में हैं और उन्होंने जानबूझकर भगवा झंडा वहाँ लगाया था ताकि आरोप हिंदुओं पर जाये. भ्रष्ट और गद्दार सेकुलर सिर्फ वोट बैंक के लिए हिंदुओं के धर्मान्तरण की खुली छूट देने वाले और मौन रखने वाले उन धर्मान्तरित हिंदुओं के घर वापसी पर जैसा शोर मचाते हैं वो खतरनाक हैं. आखिर ये धर्मान्तरण विरोधी कानून और समान नागरिक संहिता का विरोध क्यों करते हैं. सीधी से बात हैं की ये तथाकथित सेकुलर सिर्फ भ्रष्ट ही नहीं बल्कि हिन्दुओ और हिन्दुस्तान के दुश्मन और गद्दार भी है.

साभार: फेसबुक से 


Tuesday, January 20, 2015

दुनिया का इतिहास पुछता/ श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी


दुनिया का इतिहास पुछता,
रोम कहाँ, युनान कहाँ?
घर_घर में शुभ_अग्नि जलाता,
वह उन्नत इरान कहाँ है ?
बुझे दीप पश्चिमी गगन के,
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा ।
किंतु, चीर कर तम की छाती,
चमका हिन्दुस्तान हमारा ।
शत_शत आघातों को सहकर,
जीवित हिन्दुस्तान हमारा ।
जग के मस्तक पर रोली सा,

शोभित हिन्दुस्तान हमारा ।

Tuesday, January 13, 2015

भारत का उन्नत समाज और विश्व भाग -II

आज भले ही विज्ञान कितना भी तरक्की कर ले लेकिन आज के आधुनिक विज्ञान भी वैदिक विज्ञान के आगे बौना ही नजर आता है लेकिन मानने वाले आज भी मानते है की वेदों में वर्णित विज्ञान केवल काल्पनिक है, आज से  कुछ शताब्दी पहले पृथ्वी के चक्कर लगाने वाले मार्ग को सही बताने वाले पश्चिमी विचारको को पश्चिमी समाज जला कर मार डालता था लेकिन वैदिक काल से ही हम सूर्य भगवान के उतारायण और दक्षिणायन गमन को बताने वाला वैदिक विज्ञान आज के लिए मिथक है बस जब की हम सदियों से सूर्य के मकर रेखा में आने का पर्व मकर सक्रांति मानते आये है और आधुनिक विज्ञान भी आज ये मानता है लेकिन कुछ जाहिल लोग अभी भी वैदिक विज्ञान पर ऊँगली उठाते हुए नजर आते है जो की पश्चिम के रटे रटाये विज्ञान को पढ़ के खुद को एक वैज्ञानिक से खुद को कम नहीं मानते l

आज से 100 साल पहले भी अगर को बोलता की अमेरिका में होने वाले कुछ घटना को हम भारत में बैठ के देख सकते है तो लोग पागल घोषित कर देते और आज वो सच्चाई है जो विज्ञान दुनिया में आज लोकप्रिय है जिससे हम कही भी होने वाले खेल को अपने घर बैठे आँखों से देखते है लेकिन महाभारत के युद्ध में संजय के द्वारा आँखों देखा हाल महाराज धृतराष्ट्र को सुनाना उनको मिथक लगता है क्या ये वैदिक समय के उन्नत विज्ञान का चमत्कार नहीं है जो की हमारे धार्मिक ग्रंथो में भी वर्णित हैl उस समय के अमोघ अस्त्र और ब्रम्हास्त्र जिस से की पुरे श्रृष्टि की विनाश होने की बात कही गयी है वो ही आज का परमाणु और अणु बम है लेकिन फिर भी दिमाग से खाली लोग अभी भी उन पर सवालिया निशान ही लगाते है की वो सब काल्पनिक बाते है, कल्पना भी कभी भी असामान्य नहीं होती कल्पना वही करता है जो सामने देखता है लेकिन पश्चिम और लाल बंदरो के पढाये गए शैक्षिक दस्तावेजो से हम इतने मुर्ख हो गए है की हमें सही और गलत में अंतर पता नहीं चलता l
विमानों का वर्णन वैदिक काल से ही उल्लेखित है और अमेरिका भी मानता है की वैदिक काल के विमान कला आज के विमान विज्ञान से काफी आगे है जो मन के गति से उड़ान भरते थे लेकिन आज विमान को उड़ते देख के भी लोग ये नहीं समझ पते की क्यों नहीं वैदिक कल के भी लोग विज्ञान कला से भली भांति परिचित थे l विमान कला ही क्यों अन्तरिक्ष विज्ञान से लेके गणित के कठिन से कठिन प्रमेय भी वेदों में उल्लेखित है और तो और न्यूटन के गुरुत्वकर्षण नियम से बहुत पहले ही भारत के ऋषि महर्षियो ने इस विज्ञान को भली भाति समझते थे और तो और विश्व में पहली सर्जरी से लेकर विकसित चिकित्सा प्रणाली भारत में प्रचलित थी लेकिन आज कल इसी बात पर बहस हो रही है की वो विज्ञान था या बस मिथक ? जो अभी भी इस बात पर संदेह कर रहा हो उसे अपने मानसिक इलाज के लिए तैयार रहना चाहिए क्यूंकि वो सभी तथ्य जो की वेदों में वर्णित है वो आज के आधुनिक विज्ञान से कही आगे है चाहे हो सूर्य से पृथ्वी की दुरी हो या फिर प्रकाश की गति सब वेदों में वर्णित है और आज भी वो सत्य है उन्हें आधुनिक विज्ञान झुठला नहीं सकता और  नहीं वेदों में कही बाइबिल और कुरान की तरह पृथ्वी को चपटा या सपाट नहीं बताया गया है बल्कि हम कह सकते है की आधुनिक विज्ञान भी वेदों की कही बातो को ही सही साबित करते है l लेकिन फिर भी अंग्रेजो के गुलाम उनके नाजायज औलाद भी भी हल्ला करते है की वो वैदिक विज्ञान तथ्यपूर्ण नहीं थे तो फिर अफ़सोस ही होता है इन पढ़े लिखे मूर्खो पर l
सूर्य नारायण के मकर रेखा में प्रवेश करने का पर्व मकर सक्रांति की सबको हार्दिक शुभकामनाये !


Tuesday, January 6, 2015

भारत का उन्नत समाज और विश्व भाग -1

भारतवर्ष को जी भर के लुटने के बाद बाहर के लुटेरो का मन नहीं भरा तो उन्होंने भारत के इतिहास के साथ जबरदस्त छेड़छाड़ किया, ताकि वो भारतवर्ष पर जी भर के शासन कर सके l मुस्लिम शासको ने जहा भारत में धन और पद का लालच के साथ जान से मारने की धमकी के साथ हमारे उपर शासन किया लेकिन उन्होंने भारत के शूरवीरो का मनोबल तोड़ने में विफल रहे क्यूंकि पुरे भारत में उनका शासन स्थापित नहीं हो पाया था उस समय इस्लाम की आंधी पुरे एशिया को अपने कब्जे में ले चुकी थी बस उत्तर-पूर्व में बसे जापान और चीन ही इस आंधी से बचे थे बाकि भारत के पूर्व में बसे इंडोनेशिया और मलेशिया जो की भारत की तरह हिन्दू-बौद्ध धर्म के अनुयायी थे वो पुरे तरह इस्लाम अपना चुके थे लेकिन बस पूण्य भूमि भारत अभी भी इस्लाम को स्वीकार करना दूर उसे अभी भी संघर्ष कर रहा था लगभग 1000 सालो के शासन के बावजूद भारत कभी भी इस्लाम को अंगीकार नहीं कर सका था बस कुछ बुजदिल लोग जो धन और जान के डर से पश्चिम की ओर मुह करके अपने पिछवाड़े को पूर्व की ओर करना सिख गए थे लेकिन फिर भी भारत की मुख्यधारा हिंदुत्व का कोई जवाब नहीं खोज सके l

औरंगजेब के पतन के साथ ही भारतवर्ष पर अंग्रेजो ने अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी थी क्यूंकि औरंगजेब  अपने पूर्वजो की सलाह के बावजूद वो गलती कर बैठा जो मुग़ल सल्तनत के बाकि बादशाहों ने कभी नहीं किया, औरंगजेब जो की जिन्दा पीर के नाम से मशहूर था उसने समाज में हिन्दू बहुल समाज से दुश्मनी मोल ले लिया और हिन्दुओ का जी भर के दमन किया और उसका फल उसे बहुत जल्दी मिला जब हिन्दू सम्राट शिवाजी महाराज और पश्चिम भारत में सिख साम्राज्य ने उसे कभी भी चैन की सांस नहीं लेने दिया और उसे मरते समय भी कभी चैन नहीं आया और दक्षिण भारत के एक अभियान में उसने अपने अंतिम सांस लिया यह कहना गलत नहीं  होगा की औरंगजेब ने ही भारत में मुग़ल साम्राज्य के लिए ताबूत तैयार किया था जो उसने हिन्दुओ से दुश्मनी मोल ली थी उसके बाकि के पूर्वजो ने हिन्दुओ के दुशमनी के साथ दोस्ती और रिश्ते भी स्थापित करी थी लेकिन जिन्दा पीर बनने की चाहत ने औरंगजेब की हालत ऐसी कर दी की बाद के मुग़ल शासक बस इतना कमजोर बन गए की वो अपनी इज्जत भी न बचा सके उनके सेनानायक समेत उनके वजीरो ने उनकी हालत इतनी कमजोर कर दी की वो आखिर में आधुनिक भारत में अभी भी मुगलों के वंशज चाय बेचते है या फिर भुखमरी के कगार पर है ...... बाकि  का लेख अगले अंक में


Monday, January 5, 2015

देश की गद्दार मीडिया और सेखुलर समाज

जब 2008 में UPA सरकार थी तब नाव से ही आये कुछ तस्करों ने मुंबई में भारी तबाही मचाई थी और उस समय खान्ग्रेस एंड पूरा गैंग इस हमलो को रोकने में नाकाम हो गया था लेकिन अभी भाजपा सरकार ने जिस तरह पूरी तरह से इस तरह के हमले जो की “प्रवासी भारतीय” दिन के होने वाली थी उसे रोका है उससे खतरनाक मंसूबे बनाने वाले तो खिन्न हुए ही होंगे लेकिन खान्ग्रेस एंड गैंग जिस तरह से उस बोट वालो के लिए वकालत कर रही है उसे देख ये यही लगता है की या तो ये गैंग वैसा ही खतरनाक मंसूबे में शामिल थी या फिर उसे बड़ा ही दुःख हुआ की क्यों हमला नहीं हुआ इस देश में ध्यान रहे की वह 12 जनवरी के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी भी जाने वाले थे l 

अगर उनपर हमला होता तो देश में क्या होता सभी जानते है और अगर प्रवासी भारतीय मेला में अगर हमला होता तो उस में भी काफी बड़ा नरसंहार होता और वो भी प्रवासियों का पुरे भारत का विश्व के सामने ख़राब तस्वीर बन जाती और प्रधानमंत्री जो की इतने मेहनत से लगे है भारत में निवेश का माहौल बनाने में वो सारा माहौल ख़राब हो जाताl आखिर कौन है इन हमलो के पीछे ??? या तो भारत में निवेश रोकने वाले या फिर प्रधानमंत्री की हत्या कर के देश में अराजकता फ़ैलाने वाले ??? और अगर दोनों में से कोई हो लेकिन दोनों के इरादे भारत के लिए सही नहीं है और सबसे बड़ी बात इनकी तरफदारी करने वाली खान्ग्रेस और मिडिया क्यों उनका बचाव कर रही है ?? दो मिडिया समूह ने तो इसके लिए खास कार्यक्रम चलाया NDTV ने इस पर बहस चलायी की वो स्मगलर थे और The Indian Express ने एक आर्टिकल अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर इसके लिए खास लेख लिखा की तटरक्षक बल ने पाकिस्तान के मछुवारो की नाव पर हमला करके उसे जला दिया l

और इनके इसी करतूतों की वजह है की इसमें पाकिस्तानी सेना के भागीदारी के बावजूद पाकिस्तान सीमा पर हम पर हमले करता है क्यूंकि उसे पता है की भले ही खान्ग्रेस एंड गैंग सत्ता में नहीं  हो  लेकिन पैसे का वो नमक अदा कर के रहेगीl शर्म आती है देश के इन गद्दारों पर और सबसे ज्यादा आश्चर्य होता है इस देश की निक्कमी जनता की जो इतना सब कुछ खुल्ला देख के भी इन देशद्रोहियों की असलियत नहीं समझ रही l क्या हम इतने मुर्ख है जो की देश के दुश्मन आज देश में खुले आम इस तरह से सरेआम देश को बदनाम कर रही है और हम भेड़ बकरी की तरह उनकी तरफ देख रहे है 

Saturday, January 3, 2015

खुद का पतन करता हिन्दू समाज


भारतीय समाज हमेशा से अपने ज्यादा उदार होने का खामियाजा उठाता आया है लेकिन इससे हमने कोई सिख नहीं लिया हैl प्राचीन काल में जब राजतन्त्र का दौर था और उस समय में राजा जिस धर्म को मानता था उसे जबरन प्रजा पर भी थोपा जाता था लेकिन हमारे भारतीय समाज में ऐसा कोई जबरदस्ती नहीं थी लोग धर्मं और अपने और भी निर्णय के लिए स्वतंत्र थे, ये जोरदार तमाचा है उन कथित पाखंडियो के मुह पर जो अभी सभ्यता और संस्कृति के लिए पश्चिम का अनुसरण करते हैl हमारी मातृभूमि ने दुनिया को कई पंथ दिए बौद्ध धर्म जिसको मानने वाले जी भर के हिंदुत्व को कोसते है लेकिन जिस समय बौद्ध धर्म का उदय हो रहा था तो उसे संरक्षण देने वाले साम्राज्य हिन्दू साम्राज्य थे और खुद तब के हर्यंक वंश के सम्राट बिम्बिसार ने इस धर्म के बहुत बड़े संरक्षक थे लेकिन कुछ मुर्ख लोग अभी भी मुगलों और अंग्रेजो का इतिहास पढ़ कर हिन्दुत्व और हिन्दू समाज को गाली देने से नहीं चुकते बस जरा सोचिये अगर महात्मा बुद्ध यूरोप या अरब में होते तो उनके साथ क्या होता ?? लेकिन झूठा इतिहास पढ़ के गुमराह हुए एक बड़े जन समुदाय को आप कैसे समझा सकते जब उनके दिमाग में जाति पाती का झूठा जहर भर दिया गया हो और बौद्ध पंथ ही क्यों भारत की समृद्ध धरा तो जैन पंथ, सिख पंथ की भी जननी है l इन पन्थो के अलावा भी भारत हमेशा से दुसरे पन्थो के लिए भी शरण स्थली साबित हुआ है l जब इस्लाम अरब समाज में फ़ैल रहा था तो फारस का पुराना धर्म जरथ्रुस्त के अनुयायियों का जबरदस्त नरसंहार हुआ और जो जान बचा के भागे उन्हें भारत की पुण्य भूमि ने ही शरण दिया जिन्हें आज हम पारसी समुदाय  बोलते है और हालत आज ये है की पूरी दुनिया में आज पारसी  बस भारत में ही पाए जाते है l


हम सहिष्णुता के साथ बस एक गलती कर जाते है की अपने साथ होने वाली गलतियो को नजरअंदाज कर देते है जो की अतीत से हमें बार बार सोचने पर मजबूर करती है लेकिन फिर भी हम अपनी गलतियो से बाज नहीं आते l अभी उदाहरण के लिए देखिये कैसे हिन्दू की भावनाओ का मजाक खुद उन्ही के देश में खुद उनकी चुनी सरकार उड़ाती है, जनवरी 2013 में एक फिल्म आई थी “विश्वरूपम” जिसे हमारे देश के बड़े कलाकार कमल हासन ने बनाया था उसमे तालिबान के असली कृत्यों को दर्शाया गया था जिसके चलते हमारे देश के मुसलमानों की भावनाए आहत हो गयी थी और नौबत यहाँ तक आ गई थी की कमल हासन साहब उस समय के खान्ग्रेस सरकार से इतने आहत हो गए थे की उन्होंने देश छोड़ने की धमकी भी दे दी थी लेकिन फिर भी सरकार ने उनसे माफ़ी मंगवाई और साथ में फिल्म के कुछ दृश्य भी हटाई गई फिर फिल्म रिलीज हुई और अभी कुछ दिन पहले एक तमिल फिल्म “शिवम्” में कुछ दृश्यों के ऊपर सेंसर बोर्ड ने ये कहते हुए कैंची चला दी की इससे समुदाय विशेष की भावनाए आहत हो रही है लेकिन उसी सेंसर बोर्ड को PK में कुछ गड़बड़ नजर नहीं आई क्यूंकि वो हिन्दुओ के   खिलाफ है न की कुछ समुदाय विशेष के खिलाफ और तो और हमारे देश के एक होनहार मुख्यमंत्री ने तो इसे टैक्स फ्री कर दिया ताकि वो खुद को फिल्म  के साथ अरब नस्ल का होने का प्रमाण दे सके l


अभी भी समय है नहीं तो वो दिन दूर नहीं है जब हम भी पुराने पारसी धर्म की तरह विलुप्त प्राय हो जायेंगे अगर सही समय पर हम नहीं चेते तो क्यूंकि वो भी अपने ज़माने में बहुत ही उदार हुआ करते थे और आज  उनकी गिनती उंगलियो पर हो सकती हैं वो भी किसी दुसरे देश में तो समय रहते जाग जाओ हिन्दुओ नहीं तो आने वाला समय बहुत दुश्वार हो सकता है