Monday, June 29, 2015

ओम पर्वत, जहां प्रकृति स्वयं जाप करती हैं "ऊँ" का

ओम पर्वत, जहां प्रकृति स्वयं जाप करती हैं "ऊँ" का
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वीडियो : https://www.youtube.com/watch?v=J8HmFPNOqgw
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प्राचीन पौराणिक आख्यानों में कहा गया है कि इस पूरे विश्व में आठ स्थानों पर प्राकृतिक रूप से ओम बना हुआ है
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प्राचीन पौराणिक आख्यानों में कहा गया है कि इस पूरे विश्व में आठ स्थानों पर प्राकृतिक रूप से ओम बना हुआ है। इनमें से अभी तक सिर्फ एक ही जगह कैलाश मानसरोवर पर स्थित ओम को ढूंढा जा सका है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाते समय एक बर्फीले पर्वत पर प्राकृतिक रूप से बने इस ओम को स्पष्ट देखा जा सकता है।
पश्चिमी नेपाल के दरचुला जिले तथा उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित हिमालय की पर्वतमाला में यह पर्वत आता है। इसे छोटा कैलाश भी कहा जाता है। बाबा अमरनाथ की ही तरह यहां पर बर्फ इस तरह से गिरती है कि स्वयं ही पवित्र हिंदू चिन्ह ओम का निर्माण हो जाता है।
सुनाई देती है ओम की ध्वनि



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कैलाश मानसरोवर पर जाने वाले श्रद्धालु साधुओं के अनुसार इस पर्वत के दर्शन से अलौकिक शांति मिलती है। भगवान शिव के दर्शन के लिए आने वाले काफी तीर्थयात्री इस पर्वत को छूकर यहां अपना सम्मान दर्शाते हैं और अपने जीवन को धन्य बनाते हैं। तीर्थयात्री बताते हैं कि यहां पर ओम की ध्वनि भी स्पष्ट रूप से सुनी जा सकती है। उनके अनुसार यहां पहुंचने पर अदभुत और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है जो पूरे मन, मस्तिष्क और शरीर को आध्यात्मिकता से भर देती है। यहां पहुंचने पर मन के बुरे विचार खुद-ब-खुद ही खत्म हो जाते हैं, और आदमी समाधि का अनुभव करने लगता है।
कई पर्वतारोहियों ने किया इसे फतह करने का प्रयास
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कई पर्वतारोही ऊँ पर्वत को जीतने का प्रयास कर चुके हैं। सबसे पहला प्रयास भारतीय ब्रिटिश टीम ने किया था। इस टीम ने तय किया कि वह धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए पर्वत की चोटी से दस मीटर (30 फीट) पहले ही रूक जाएंगे हालांकि वह तूफानी मौसम के कारण लक्ष्य से 200 मीटर (660 फीट) पहले से ही लौट आए।
8 अक्टूबर 2004 को पर्वतारोहियों की एक टीम ने इसे जीतने का सफल प्रयास किया और चोटी पर पहुंचने के कुछ ही मीटर पहले रूक गए। यहां उन्होंने पर्वत के प्रति सम्मान दिखाया और वापिस लौट आए।

Saturday, June 27, 2015

मुस्लिम युवक के दूसरी शादी करने पर लोगों ने किया बहिष्कार, तनाव

इस्माइलाबाद (कुरुक्षेत्र) : सलपानी कलां गांव में पीर मोहम्मद अजाद खान औलिया दरगाह के खादिम के पुत्र द्वारा दूसरी शादी करने पर ग्रामीणों ने उसके परिवार का बहिष्कार कर दिया और खादिम को भी गांव छोडऩे का फरमान सुना दिया। वहीं ग्रामीणों का एक पक्ष इस बात पर अड़ गया कि खादिम गांव नहीं छोड़ेगा। इसे लेकर दोनों पक्षों के बीच तनातनी हो गई।

थाना झांसा प्रभारी के समझाने के बाद भी ग्रामीण नहीं माने। जिसके उपरांत जिला प्रशासन की ओर से डीडीपीओ, पुलिस उपाधीक्षक सतीश गौतम, पुलिस उपाधीक्षक गुरमेल ङ्क्षसह, पुलिस उपाधीक्षक कृष्ण कुमार सहित पुलिस बल मौके पर पहुंच गया। पुलिस व प्रशासन ने दोनों पक्षों के बीच समझौता कराया। ग्रामीण इस शर्त पर राजी हुए कि दरगाह में दूसरा खादिम रखा जाए, जबकि वह परिवार सहित गांव में रह सकता है।
पुलिस के मुताबिक सलपानी कलां गांव में स्थित पीर मोहम्मद अजाद खान औलिया दरगाह पर बख्शीश खान नामक खादिम के पुत्र अली उर्फ कालू ने यमुनानगर की लड़की से हाई कोर्ट में दूसरी शादी कर ली। उसकी पहली बीवी गांव में ही रहती है। शुक्रवार को वह दूसरी पत्नी को लेकर गांव में पहुंचा, जिस पर ग्रामीण भड़क गए। ग्रामीणों का कहना था कि इससे गांव का माहौल खराब होगा। उसे व उसके परिवार को गांव में नहीं रहने दिया जाएगा।

मामले की जानकारी जिला प्रशासन को भी मिली। जानकारी मिलते ही थाना झांसा प्रभारी सतीश कुमार मौके पर पहुंचे और उन्होंने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया, मगर ग्रामीण नहीं माने। थाना प्रभारी ने इसकी सूचना आला अधिकारियों को दी। जिसके बाद डीडीपीओ, पुलिस उपाधीक्षक सतीश गौतम, पुलिस उपाधीक्षक गुरमेल सिंह, पुलिस उपाधीक्षक कृष्ण कुमार सहित पुलिस बल मौके पर पहुंचे।

ग्रामीणों के साथ हुआ विवाद मुस्लिम युवक जब दूसरी पत्नी को लेकर गांव पहुंचा था तो ग्रामीणों के साथ उसका झगड़ा भी हुआ। विवाद को बढ़ता देख वह युवती को अपने साथ लेकर चला गया। लोगों ने पुलिस के सामने भी यह शर्त रखी कि युवक दोबारा गांव में नहीं आना चाहिए।

सामान लादकर जाने लगा था परिवार

ग्रामीणों के विरोध के बाद मुस्लिम परिवार अपना सामान लादकर गांव से जाने लगा था। इसके बाद गांव का दूसरा पक्ष इस परिवार के समर्थन में आया और जिला प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद परिवार गांव में रहने देने पर सहमति बनी।

कब्रिस्तान की जमीन को लेकर भी विवाद

ग्रामीणों की मानें तो गांव में कब्रिस्तान की जमीन को लेकर भी विवाद चल रहा है। कुछ लोगों ने कब्रिस्तान की जमीन दबा रखी है। दरगाह के खादिम बसीर खान ने अदालत में केस भी डाला हुआ है। इस पूरे विवाद को इससे भी जोड़कर देखा जा रहा है। इस घटना के बाद पुलिस गांव के माहौल पर नजर रखे हुए है।

Friday, June 26, 2015

मक्का मे विराजित प्रसिद्ध मक्केश्वर महादेव शिवलिंग

सम्पूर्ण विश्व क्या भारत के लोग ही यह कटु सत्य स्वीकार नही कर सकते कि इस्लाम ने हिन्दू की आस्था माने जाने वाले असंख्य मंदिर तोड़े है और उनके स्थान पर उसी मंदिर के अवशेष से मस्जितों को निर्माण करवाया। इस्लामिक विध्वंशक गतिविधियां इतनी प्रंचडता के साथ की जाती थी कि तक्षशिला विश्वविद्यालय और सोमनाथ मंदिर विध्वंश किये गये। इस्लाम नीव इस आधार पर रखी गई कि दूसरों के धर्म का अनादर करों और उनको नेस्तानाबूत और पवित्र स्थलों को खंडित कर वहाँ मस्जित और मकबरे का निर्माण किया किया
जाए। इस काम बाधा डालने वाले जो लोग भी सामने आये उन लोगो को मौत के घाट उतार दिया जाये। भले ही वे लोग मुस्लिमो को परेशान न करते हो।





मुहम्मद साहब और मुसलमानों के हमले से मक्का और मदीना के आस पास का पूरा इतिहास बदल दिया गया। इस्लाम एक तलवार पे बना धर्म था है और रहेगा और इसका अंत भी उस से ही होगा। मुसलमाने के पैगम्बर मुहम्मद एक ऐसे विध्वंसक गिरोह का नेतृत्व करते थे जो धन और वासना के पुजारी थे। मुहम्मद ने
मदीना से मक्का के शांतिप्रिय मुर्तिपूजकों पर हमला किया और जबरजस्त नरसंहार किया। मक्का का मदीना के अपना अगल अस्तितव था किन्तु मुहम्मद साहब के हमले के बाद मक्का मदीना को एक साथ जोड़कर देखा जाने लगा। जबकि मक्का के लोग जो कि शिव के उपासक माने जाते है। मुहम्मद की टोली ने मक्का में स्थापित कर वहां पे स्थापित की हुई 360 में से 359 मूर्तियाँ नष्ट कर दी और सिर्फ काला पत्थर सुरक्षित रखा जिसको आज भी मुस्लिमों द्वारा पूजा जाता है। उसके अलावा अल-उज्जा, अल-लात और मनात नाम की तीन
देवियों के मंदिरों को नष्ट करने का आदेश भी महम्मद ने दिया और आज उन मंदिरों का नामो निशान नहीं है (हिशम इब्नअल-कलबी, 25-26)।

इतिहास में यह किसी हिन्दू मंदिर पर  सबसे पहला इस्लामिक आतंकवादी हमला था।उस काले पत्थर
की तरफ आज भी मुस्लिम श्रद्धालु अपना शीश जुकाते है। किसी हिंदू पूजा के दौरान बिना सिला हुआ वस्त्र या धोती पहनते हैं, उसी तरह हज के दौरान भी बिना सिला हुआ सफेद सूती कपड़ा ही पहना जाता है।
मुसलमानों के सबसे बड़े तीर्थ मक्का मक्केश्वर महादेव का मंदिर था। वहां काले पत्थर का विशाल शिवलिंग था जो खंडित अवस्था में अब भी वहां है। हज के समय संगे अस्वद (संग अर्थात पत्थर, अस्वद अर्थात अश्वेत यानी काला) कहकर मुसलमान उसे ही पूजते और चूमते हैं। इस सम्बन्ध में प्रख्यात प्रसिद्ध इतिहासकार स्व0 पी.एन.ओक ने अपनी पुस्तक ‘वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास’ में समझाया है कि मक्का और उस इलाके में इस्लाम के आने से पहले से मूर्ति पूजा होती थी। हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर थे, गहन रिसर्च के बाद उन्होंने यह भी दावा किया कि काबा में भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग है।

पैगंबर मोहम्मद ने हमला कर मक्का की मूर्तियां तोड़ी थीं। यूनान और भारत में बहुतायत में मूर्ति पूजा की जाती रही है, पूर्व में इन दोनों ही देशों की सभ्यताओं का दूरस्थ इलाकों पर प्रभाव था। ऐसे में दोनों ही इलाकों के कुछ विद्वान काबा में मूर्ति पूजा होने का तर्क देते हैं। हज करने वाले लोग काबा के पूर्वी कोने पर जड़े हुए एक काले पत्थर के दर्शन को पवित्र मानते हैं जो कि हिन्दूओं का पवित्र शिवलिंग है। वास्तव में इस्लाम से पहले मिडिल-ईस्ट में पीगन जनजाति रहती थी और वह हिंदू रीति-रिवाज को ही मानती थी। एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसर है कि काबा में “पवित्र गंगा” है।

जिसका निर्माण वेज्ञानिक रावण ने किया था, रावड़ शिव भक्त था वह शिव के साथ गंगा और चन्द्रमा के महात्म को समझता था और यह जानता था कि कि कभी शिव को गंगा से अलग नही किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है। इस्लामिक काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म) ही माना जाता था। रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावड़ को एक शिवलिंग प्रदान किया जिसें लंका में
स्थापित करने का कहा और बाद जब रावड़ आकाश मार्ग से लंका की ओर जाता है पर रास्ते में कुछ ऐसे हालत बनते हैं की रावण को शिवलिंग धरती पर रखना पड़ता है। वह दुबारा शिवलिंग को उठाने की कोशिश करता है पर खूब प्रयत्न करने पर भी लिंग उस स्थान से हिलता नहीं। वेंकटेश पण्डित के अनुसर यह स्थान वर्तमान में सऊदी अरब के मक्का नामक स्थान पर स्थित है। सऊदी अरब के पास ही यमन नामक राज्य भी है जहाँ श्री कृष्ण ने कालयवन नामक राक्षस का विनाश किया था। जिसका जिक्र श्रीमदभगवत पुराण में भी
आता है। पहले राजा भोज ने मक्का में जाकर वहां स्थित प्रसिद्ध शिव लिंग मक्केश्वर महादेव का पूजन किया था, इसका वर्णन
भविष्य-पुराण में निम्न प्रकार है :-
"नृपश्चैवमहादेवं मरुस्थल निवासिनं !
गंगाजलैश्च संस्नाप्य पंचगव्य समन्विते :
चंद्नादीभीराम्भ्यचर्य तुष्टाव मनसा हरम !
इतिश्रुत्वा स्वयं देव: शब्दमाह नृपाय तं!
गन्तव्यम भोज राजेन महाकालेश्वर स्थले !! "

Thursday, June 25, 2015

ऋग्वेद और क्वांटम फिजिक्स जरुर पढ़े !!

क्वांटम फिजिक्स तो ब्रह्माण्ड का रहस्य धीरे धीरे खोल रहा है बावजूद इसके इसके कई नियम अभी भी अनुमान पर आधारित हैं .
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लेकिन ऋग्वेद के नासदीय सूक्त पर आधारित ब्रहामंड के बारे में जब ये भावार्थ पढ़ा तो समझ में आया की हमारे पास कितना अमूल्य भण्डार है . सोने की चिड़िया का अर्थ अगर आप सिर्फ धन दौलत से लगा रहे हैं तो आपको एक बार फिर सोचना पड़ेगा . क्योंकि ज्ञान का अथाह सागर जब जम्बू द्वीप में लहराता था तो उसकी गूंज पुरे विश्व में सुनाई देती थी .
एक उदहारण मात्र -- ऋषियों ने कहा की मानव शारीर के साथ कोई स्वर्ग नहीं जा सकता . क्वांटम फिजिक्स कहता है की मानव शारीर भी ब्रहांड में अनन्त यात्रा नहीं कर सकता क्योंकि प्रकाश की रफ़्तार से चलने पर मनाव शरीर उस इनर्शिया को बर्दाश्त नहीं कर पायेगा .

आपके लिए ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का अर्थ दे रहा हूँ पढ़िए और समझिये की इंद्र आदि देवताओं को भी ब्रहांड के सृजन का रहस्य नहीं मालुम है क्योंकि वो भी ब्रहामंड के सृजन के बाद ही उत्पन्न हुए थे . smile emoticon
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नासदीय सूक्त
नहीं विद्यमान तब था कुछ भी,
उसका अभाव भी नहीं था तब ।
वायु भी नहीं, था व्योम नहीं,
उसे किसने ढका था, कहाँ था सब ॥
वह ब्राह्मिक द्रव, सर्वत्र व्याप्त, कितना गहरा था, किसके पास ॥
अमरत्व नहीं, तब मृत्यु नहीं थी,
नहीं प्रकाश, दिन रात न था ।
लेता था श्वास, वायु के बिन,
वह स्वयं पूर्ण था, शेष न था ॥
था केवल वह ही विद्यमान, उसके अतिरिक्त न कोई था ॥
था अन्धकार से ओत प्रोत,
केवल घनघोर तिमिर फैला ।
सब कुछ तब था द्रव के सदृश,
नहीं था प्रकाश किंचित कैसा ॥
वह एक जो आवृत्त शून्य से था, अग्नि के गर्भ से प्रकट हुआ ॥
मन से उत्पन्न कामना ने,
आरम्भ से व्याप लिया था उसे ।
करें खोज ह्रदय में मुनि उसकी,
संबंधित 'है', 'जो नहीं' उससे ॥
सम्बन्ध जटिल है यह इसमें,
बीज सभी हैं, शक्ति सभी ।
सूक्ष्म शक्तियाँ उसके भीतर,
वृहद शक्तियाँ बाहर भी ॥
पर, कौन उसे जानता है,
और कौन बता सकता है यहाँ ।
आरम्भ हुआ इसका था कब,
और कहाँ आदि है, अंत कहाँ ॥
पश्चात सृजन के देव हुए,
तब किसे पता यह, कब था बना ।
गर्भ से जिसके सृजन हुआ,
यह उसने किया, या उसके बिना॥
सृष्टि यह कैसे बनी थी,
कब हुआ आरम्भ था ।
यह व्योम का अध्यक्ष जाने,
या उसे भी नहीं पता ॥
-Kumar Nandan

Tuesday, June 23, 2015

बर्मा के बौद्ध गुरु विराथु जी ने आखिर किस तरीके से मुस्लिम को भगाया या कमज़ोर किया समझो.....

बर्मा के बौद्ध गुरु विराथु जी ने आखिर किस तरीके से मुस्लिम को भगाया या कमज़ोर किया समझो...
जैसे मुसलमानों का '७८६' का नंबर लकी माना जाता है ..वैसे ही विराथु ने '९६९ ' का नंबर निकाला ... और उन्होंने पुरे देश के लोगों से आह्वान किया ... कि जो भी राष्ट्रभक्त बौद्ध है वो इस स्टीकर को अपने अपने जगह पर लगायें ...

इसके बाद टैक्सी चलाने वालों ने टैक्सी पर... दूकान वालों ने दूकान पर .... इसको लगाना शुरू किया ... लेकिन विराथु का सन्देश साफ़ था ... कि हम बौद्ध अपने सारे खरीदारी और व्यापार वहीँ करेंगे जहां ये स्टीकर लगा होगा ... .किसी को टैक्सी में चढ़ना हो तो उसी टैक्सी में चढ़ेंगे जिसके ऊपर ये स्टीकर होगा .... उसी रेस्टोरेंट में खायेंगे जहां ये स्टीकर होगा ।

उन्होंने ये भी कहा कि हो सकता है ऐसी हालत में मुस्लिम सऊदी से आये पैसों के दम पर अपने माल को कम कीमत पर बेच कर आपको आकर्षित करे ... लेकिन आप ध्यान रखना ... आप दो पैसा ज्यादा देना ... और सोचना कि आपने अपने देश के लिए पैसा लगाया है ... दो पैसे कम में खरीद कर मातृभूमि से गद्दारी मत करना .... वो आपके पैसे आपको ही मिटाने में लगाते हैं...मुर्खता मत करना ...

दोस्तों ... हालत ये हो गए .. कि मुस्लिम के व्यापार ठप्प पड़ गए... मुस्लिम इतने आतंकित हुए कि इस स्टीकर लगे टैक्सी को चढ़ना तो दूर ... किनारे से कन्नी काटने लगे... पुरे देश में मुसलमानों के होश ठिकाने आ गए ... और फिर ये स्टीकर एक तरह से देशभक्ति का प्रमाण बन गया... उनके जिहाद का जवाब बन गया.... और इस अनोखे आईडिया का प्रभाव आप देख सकते हैं कि आज बर्मा से मुस्लिम भाग चुके हैं...

अगर आप भी इन मुसलमानो की अकल ठिकाने लगाने चाहते है तो सिर्फ हिन्दुओ व आर्यो से ही व्यापार करे।
अगर सभी हिन्दू भाई अपनी कार्यस्थलो पर ॐ का या जय श्री राम का स्टिकर लगाये तो मुस्लिम जिहाद को बहुत बड़ी चोट पहुंचाई जा सकती है।

महान कौन सिकंदर या वीर पोरस ??

पोरस का साम्राज्य : पुरुवंशी महान सम्राट पोरस का साम्राज्य विशालकाय था। महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। पोरस का साम्राज्य जेहलम (झेलम) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में रहने वाले खोखरों ने राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हत्या का बदला लेने के लिए मुहम्मद गोरी को मौत के घाट उतार दिया था।

‘पोरस अपनी बहादुरी के लिए विख्यात था। उसने उन सभी के समर्थन से अपने साम्राज्य का निर्माण किया था जिन्होंने खुखरायनों पर उसके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था। जब सिकंदर हिन्दुस्तान आया और जेहलम (झेलम) के समीप पोरस के साथ उसका संघर्ष हुआ, तब पोरस को खुखरायनों का भरपूर समर्थन मिला था। इस तरह पोरस, जो स्वयं सभरवाल उपजाति का था और खुखरायन जाति समूह का एक हिस्सा था, उनका शक्तिशाली नेता बन गया।’ -आईपी आनंद थापर (ए क्रूसेडर्स सेंचुरी : इन परस्यूट ऑफ एथिकल वेल्यूज/केडब्ल्यू प्रकाशन से प्रकाशित)

सिन्धु और झेलम : सिन्धु और झेलम को पार किए बगैर पोरस के राज्य में पैर रखना मुश्किल था। राजा पोरस अपने क्षेत्र की प्राकृतिक स्थिति, भूगोल और झेलम नदी की प्रकृति से अच्छी तरह वाकिफ थे। महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। पुरु ने इस बात का पता लगाने की कोशिश नहीं की कि यवन सेना की शक्ति का रहस्य क्या है? यवन सेना का मुख्य बल उसके द्रुतगामी अश्वारोही तथा घोड़ों पर सवार फुर्तीले तीरंदाज थे।

इतिहासकार मानते हैं‍ कि पुरु को अपनी वीरता और हस्तिसेना पर विश्वास था लेकिन उसने सिकंदर को झेलम नदी पार करने से नहीं रोका और यही उसकी भूल थी। लेकिन इतिहासकार यह नहीं जानते कि झेलम नदी के इस पार आने के बाद सिकंदर बुरी तरह फंस गया था, क्योंकि नदी पार करने के बाद नदी में बाढ़ आ गई थी।
जब सिकंदर ने आक्रमण किया तो उसका गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने स्वागत किया और आम्भी ने सिकंदर की गुप्त रूप से सहायता की। आम्भी राजा पोरस को अपना दुश्मन समझता था। सिकंदर ने पोरस के पास एक संदेश भिजवाया जिसमें उसने पोरस से सिकंदर के समक्ष समर्पण करने की बात लिखी थी, लेकिन पोरस ने तब सिकंदर की अधीनता स्वीकार नहीं।

जासूसों और धूर्तता के बल पर सिकंदर के सरदार युद्ध जीतने के प्रति पूर्णतः विश्वस्त थे। राजा पुरु के शत्रु लालची आम्भी की सेना लेकर सिकंदर ने झेलम पार की। राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी 7 फुट से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े। पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों का जिस भयंकर रूप से संहार किया था उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे थे।

भारतीयों के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के हठ, शक्तिशाली गजसेना के अलावा कुछ अनदेखे हथियार भी थे जैसे सातफुटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई-कई शत्रु सैनिकों और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिकों भी मार गिरा सकता था। इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली। सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए। यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया। कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है। राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत-भवकपाली) को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया। ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी होते हुए नहीं देखा था।
सिकंदर जमीन पर गिरा तो सामने राजा पुरु तलवार लिए सामने खड़ा था। सिकंदर बस पलभर का मेहमान था कि तभी राजा पुरु ठिठक गया। यह डर नहीं था, शायद यह आर्य राजा का क्षात्र धर्म था, बहरहाल तभी सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहां से भगा ले गए।

सिकंदर की सेना का मनोबल भी इस युद्ध के बाद टूट गया था और उसने नए अभियान के लिए आगे बढ़ने से इंकार कर दिया था। सेना में विद्रोह की स्थिति पैदा हो रही थी इसलिए सिकंदर ने वापस जाने का फैसला किया। सिकंदर व उसकी सेना सिन्धु नदी के मुहाने पर पहुंची तथा घर की ओर जाने के लिए पश्चिम की ओर मुड़ी। सिकंदर ने सेना को प्रतिरोध से बचने के लिए नए रास्ते से वापस भेजा और खुद सिन्धु नदी के रास्ते गया, जो छोटा व सुरक्षित था।
भारत में शत्रुओं के उत्तर-पश्चिम से घुसने के दो ही रास्ते रहे हैं जिसमें सिन्धु का रास्ता कम खतरनाक माना जाता था।

सिकंदर सनक में आगे तक घुस गया, जहां उसकी पलटन को भारी क्षति उठानी पड़ी। पहले ही भारी क्षति उठाकर यूनानी सेनापति अब समझ गए थे कि अगर युद्ध और चला तो सारे यवनी यहीं नष्ट कर दिए जाएंगे। यह निर्णय पाकर सिकंदर वापस भागा, पर उस रास्ते से नहीं भाग पाया, जहां से आया था और उसे दूसरे खतरनाक रास्ते से गुजरना पड़ा जिस क्षेत्र में प्राचीन क्षात्र या जाट निवास करते थे।
उस क्षेत्र को जिसका पूर्वी हिस्सा आज के हरियाणा में स्थित था और जिसे 'जाट प्रदेश' कहते थे, इस प्रदेश में पहुंचते ही सिकंदर का सामना जाट वीरों से (और पंजाबी वीरों से सांगल क्षेत्र में) हो गया और उसकी अधिकतर पलटन का सफाया जाटों ने कर दिया। भागते हुए सिकंदर पर एक जाट सैनिक ने बरछा फेंका, जो उसके वक्ष कवच को बींधता हुआ पार हो गया। यह घटना आज के सोनीपत नगर के पास हुई थी।

इस हमले में सिकंदर तुरंत नहीं मरा बल्कि आगे जाकर जाट प्रदेश की पश्चिमी सीमा गांधार में जाकर उसके प्राण-पखेरू उड़ गए। (यवनी इतिहासकारों ने लिखा- सिकंदर बेबीलोन (आधुनिक इराक) में बीमारी से मरा! -326 ई.पू.)

क्या लिखते हैं इतिहासकार : कर्तियास लिखता है कि, 'सिकंदर झेलम के दूसरी ओर पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेलम नदी के एक द्वीप में पहुंच गया। पुरु के सैनिक भी उस द्वीप में तैरकर पहुंच गए। उन्होंने यूनानी सैनिकों के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। अनेक यूनानी सैनिकों को मार डाला गया। बचे-खुचे सैनिक नदी में कूद गए और उसी में डूब गए।'
बाकी बची अपनी सेना के साथ सिकंदर रात में नावों द्वारा हरनपुर से 60 किलोमीटर ऊपर की ओर पहुंच गया और वहीं से नदी को पार किया, वहीं पर भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में पुरु का बड़ा पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ।
एरियन लिखता है कि 'भारतीय युवराज ने अकेले ही सिकंदर के घेरे में घुसकर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोड़े 'बुसे फेलास 'को मार डाला।' यह भी कहा जाता है कि पुरु के हाथी दल-दल में फंस गए थे, तो कर्तियास लिखता है 'कि इन पशुओं ने घोर आतंक पैदा कर दिया था। उनकी भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोड़े न केवल डर रहे थे बल्कि बिगड़कर भाग भी रहे थे। अब सिकंदर ऐसे स्थानों की खोज में लग गए, जहां इनको शरण मिल सके।'

सिकंदर ने छोटे शस्त्रों से सुसज्जित सेना को हाथियों से निपटने की आज्ञा दी। इस आक्रमण से चिढ़कर हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पांवों में कुचलना शुरू कर दिया। वह आगे लिखता है कि 'सर्वाधिक हृदय-विदारक दृश्य यह था कि यह मजबूत कद वाला पशु यूनानी सैनिकों को अपनी सूंड से पकड़ लेता व अपने महावत को सौंप देता और वह उसका सर धड़ से तुरंत अलग कर देता। इसी प्रकार सारा दिन समाप्त हो जाता और युद्ध चलता ही रहता।' इसी प्रकार इतिहासकार दियोदोरस लिखता है कि 'हाथियों में अपार बल था और वे अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुए। अपने पैरों तले उन्होंने बहुत सारे यूनानी सैनिकों को चूर-चूर कर दिया।'
इथोपियाई महाकाव्यों का संपादन करने वाले ईएडब्ल्यू बैज लिखते हैं कि 'झेलम के युद्ध में सिकंदर की अश्व सेना का अधिकांश भाग मारा गया। सिकंदर ने अनुभव किया कि यदि मैं लड़ाई को आगे जारी रखूंगा तो पूर्ण रूप से अपना नाश कर लूंगा। अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की। भारतीय परंपरा के अनुसार पुरु ने शत्रु का वध नहीं किया। इसके पश्चात संधि पर हस्ताक्षर हुए और सिकंदर ने पुरु को अन्य प्रदेश जीतने में सहायता की।'

क्या आप जानते हैं कि नराधम नरपिशाच जेहादी गोरी द्वारा छलपूर्वक पृथ्वीराज चौहान की हत्या के बाद क्या हुआ था?????

क्या आप जानते हैं कि नराधम नरपिशाच जेहादी गोरी द्वारा छलपूर्वक पृथ्वीराज चौहान की हत्या के बाद क्या हुआ था?????
दरअसल जब नराधम जेहादी गोरी हमारे हिंदुस्तान में जिहाद फैलाकर एवं लूट-खसोट कर जब वह अपने वतन गजनी गया तो वो अपने साथ बहुत सारी हिन्दू लड़कियों और महिलाओं के साथ-साथ बेला और कल्याणी को भी ले गया था! असल में बेला हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की बेटी और कल्याणी जयचंद की पौत्री थी!
ध्यान देने की बात है कि जहाँ पृथ्वीराज चौहान महान देशभक्त थे वहीँ जयचंद ने देश के साथ गद्दारी की थी लेकिन , उसकी पौत्री कल्याणी एक महान राष्ट्रभक्त थी। 
खैर जब वो जेहादी गोरी अपने गजनी पहुंचा तो उसके गुरु ने "काजी निजामुल्क" ने उसका भरपूर स्वागत किया
और, उससे कहा कि आओ गौरी आओ हमें तुम पर नाज है कि तुमने हिन्दुस्तान पर फतह करके इस्लाम का नाम रोशन किया है!
कहो सोने की चिड़िया हिन्दुस्तान के कितने पर कतर कर लाए हो???’’
इस पर जेहादी गोरी ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा कि

‘‘काजी साहब! मैं हिन्दुस्तान से सत्तर करोड़ दिरहम मूल्य के सोने के सिक्के, पचास लाख चार सौ मन सोना और चांदी, इसके अतिरिक्त मूल्यवान आभूषणों, मोतियों, हीरा, पन्ना, जरीदार वस्त्र और ढाके की मल-मल की लूट-खसोट कर भारत से गजनी की सेवा में लाया हूं।’’
काजी :‘‘बहुत अच्छा! लेकिन वहां के लोगों को कुछ दीन-ईमान का पाठ पढ़ाया या नहीं?’’
गोरी :‘‘बहुत से लोग इस्लाम में दीक्षित हो गए हैं।’’
काजी : ‘‘और बंदियों का क्या किया?’’
गोरी : ‘‘बंदियों को गुलाम बनाकर गजनी लाया गया है और, अब तो गजनी में बंदियों की सार्वजनिक बिक्री की जा रही है।
रौननाहर, इराक, खुरासान आदि देशों के व्यापारी गजनी से गुलामों को खरीदकर ले जा रहे हैं।
एक-एक गुलाम दो-दो या तीन-तीन दिरहम में बिक रहा है।’’
काजी : ‘‘हिन्दुस्तान के मंदिरों का क्या किया?’’
गोरी : ‘‘मंदिरों को लूटकर 17000 हजार सोने और चांदी की मूर्तियां लायी गयी हैं, दो हजार से अधिक कीमती पत्थरों की मूर्तियां और शिवलिंग भी लाए गये हैं और
बहुत से पूजा स्थलों को नेप्था और आग से जलाकर जमीदोज कर दिया गया है।’’
‘‘ये तो तुमने बहुत ही रहमत का काम किया है!’’
फिर मंद-मंद मुस्कान के साथ बड़बड़ाया ‘‘गोर और कालेधनी और निर्धन गुलाम बनने के प्रसंग में सभी भारतीय एक हो गये हैं।
जो भारत में प्रतिष्ठित समझे जाते थे, आज वे गजनी में मामूली दुकानदारों के गुलाम बने हुए हैं।’’
फिर थोड़ा रुककर कहा : ‘‘लेकिन हमारे लिए कोई खास तोहफा लाए हो या नहीं?’’
गोरी : ‘‘लाया हूं ना काजी साहब!’’
काजी :‘‘क्या???’’
गोरी :‘‘जन्नत की हूरों से भी सुंदर जयचंद की पौत्री कल्याणी और पृथ्वीराज चौहान की पुत्री बेला।’’
काजी :‘‘तो फिर देर किस बात की है???’’
गोरी :‘‘बस आपके इशारे भर की।’’
काजी :‘‘माशा अल्लाह! आज ही खिला दो ना हमारे हरम में नये गुल।’’
गोरी :‘‘ईंशा अल्लाह!’’
और तत्पश्चात्, काजी की इजाजत पाते ही शाहबुद्दीन गौरी ने कल्याणी और बेला को काजी के हरम में पहुंचा दिया।
जहाँ कल्याणी और बेला की अदभुत सुंदरता को देखकर काजी अचम्भे में आ गया और, उसे लगा कि स्वर्ग से अप्सराएं आ गयी हैं।
तथा, उस काजी ने उसने दोनों राजकुमारियों से विवाह का प्रस्ताव रखा तो
बेला बोली-‘‘काजी साहब! आपकी बेगमें बनना तो हमारी खुशकिस्मती होगी, लेकिन हमारी दो शर्तें हैं!’’
काजी :‘‘कहोकहो क्या शर्तें हैं तुम्हारी! तुम जैसी हूरों के लिए तो मैं कोई भी शर्त मानने के लिए तैयार हूं।
बेला : ‘‘पहली शर्त से तो यह है कि शादी होने तक हमें अपवित्र न किया जाए क्या आपको मंजूर है?????’’
काजी : ‘‘हमें मंजूर है! दूसरी शर्त का बखान करो।’’
बेला : ‘‘हमारे यहां प्रथा है कि लड़की के लिए लड़का और लड़के लिए लड़की के यहां से विवाह के कपड़े आते हैं।
अतः , दूल्हे का जोड़ा और जोड़े की रकम हम भारत भूमि से मंगवाना चाहती हैं।’’
काजी :‘‘मुझे तुम्हारी दोनों शर्तें मंजूर हैं।’’
और फिर बेला और कल्याणी ने कविचंद के नाम एक रहस्यमयी खत लिखकर भारत भूमि से शादी का जोड़ा मंगवा लिया और, काजी के साथ उनके निकाह का दिन
निश्चित हो गया साथ ही , रहमत झील के किनारे बनाये गए नए महल में विवाह की तैयारी शुरू हुई।
निकाह के दिन वो नराधम काजी कवि चंद द्वारा भेजे गये कपड़े पहनकर काजी साहब विवाह मंडप में आया और, कल्याणी और बेला ने भी काजी द्वारा दिये गये कपड़े पहन रखे थे।
इस निकाह के बारे में सबको इतनी उत्सुकता हो गई थी किशादी को देखने के लिए बाहर जनता की भीड़ इकट्ठी हो गयी थी।
लेकिन तभी बेला ने काजी साहब से कहा-‘‘हमारे होने वाले सरताज , हम कलमा और निकाह पढ़ने से पहले जनता को झरोखे से दर्शन देना चाहती हैं, क्योंकि विवाह से
पहले जनता को दर्शन देने की हमारे यहां प्रथा है और ,फिर गजनी वालों को भी तो पता चले कि आप बुढ़ापे में जन्नत की सबसे सुंदर हूरों से शादी रचा रहे हैं।
और, शादी के बाद तो हमें जीवनभर बुरका पहनना ही है, तब हमारी सुंदरता का होना न के बराबर ही होगा क्योंकि नकाब में छिपी हुई सुंदरता भला तब किस काम
की।’’
‘‘हांहांक्यों नहीं।’’
काजी ने उत्तर दिया और कल्याणी और बेला के साथ राजमहल के कंगूरे पर गया, लेकिन वहां पहुंचते-पहुंचते ही उस ""नराधम जेहादी"" काजी के दाहिने कंधे से आग की लपटें निकलने लगी, क्योंकि क्योंकि कविचंद ने बेला और कल्याणी का रहस्यमयी पत्र समझकर बड़े तीक्ष्ण विष मंं सने हुए कपड़े भेजे थे।
इस तरह वो ""नराधम जेहादी"" काजी विष की ज्वाला से पागलों की तरह इधर-उधर भागने लगा,
तब बेला ने उससे कहा-‘‘तुमने ही गौरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए उकसाया था ना इसीलिए ,हमने तुझे मारने का षड्यंत्र रचकर अपने देश को लूटने
का बदला ले लिया है।
हम हिन्दू कुमारियां हैं और, किसी नराधम में इतनी साहस नहीं है कि वो जीते जी हमारे शरीर को हाथ भी लगा दे।’’
कल्याणी ने कहा, ‘‘नालायक! बहुत मजहबी बनते हो, और जेहाद का ढोल पीटने के नाम पर लोगों को लूटते हो और शांति से रहने वाले
लोगों पर जुल्म ढाहते हो,
थू! धिक्कार है तुम पर।’’
इतना कहकरउन दोनों बालिकाओं ने महल की छत के बिल्कुल किनारे खड़ी होकर एक-दूसरी की छाती में विष बुझी कटार जोर से भोंक दी और उनके प्राणहीन देह उस उंची छत से नीचे लुढ़क गये।
वही दूसरी तरफ उस विष के प्रभाव से ""नराधम जेहादी"" काजी पागलों की तरह इधर-उधर भागता हुआ भी तड़प-तड़प कुत्ते की मौत मर गया।
इस तरह भारत की इन दोनों बहादुर बेटियों ने विदेशी धरती पराधीन रहते हुए भी बलिदान की जिस गाथा का निर्माण किया, वह सराहने
योग्य है और, आज सारा भारत इन बेटियों के बलिदान को श्रद्धा के साथ याद करता है।
नमन है ऐसी हिन्दू वीरांगनाओं को
आज के परिदृश्य में जबकि लवजिहाद अपने चरम पर है
अगर कुछेक सौ भी हमारी हिन्दू युवतियां उन लव जेहादियों के सम्मुख समर्पण करने की जगह बेला और कल्याणी सरीखे ही हिम्मत और साहस से काम लेते हुए उन जेहादियों को सबक सिखा दें तो
फिर , मुल्ले तो मुल्ले उनकी अल्लाह की भी हिम्मत नहीं पड़ेगी हमारी हिन्दू युवतियों की ओर बुरी नजर डालने की

Sunday, June 21, 2015

सोनिया गांधी और राहुल गांधी सच में देश के लिये कलंक हैं

सोनिया गांधी और राहुल गांधी सच में देश के लिये कलंक हैं
 आज जब की पूरा विश्व भारतीय योग को लेकर उत्साहित है, और ये तथाकथित गाँधी परिवार देश से बाहर वो भी पुरे परिवार के साथ. ये कभी भारत का भला नहीं सोच सकते, हुआ यूँ की सोनिया गांधी अपनी बेटी के साथ 19 जून को देश से बाहर चली गई और उनका पप्पू 20 जून की रात देश से बाहर चला गया।

आज अंतर्राष्‍ट्रीय योग दिवस है एक ओर जहां संपूर्ण विश्‍व के 193 देश योग दिवस मना रहे हैं ये कायर कांग्रेसी देश ही छोड़कर रफू चक्‍कर हो गये। लगभग 25 देशों के राजनिकों ने राजपथ पर योग में हिस्सा लिया और ये गांधी परिवार देश का अपमान करके विदेश में गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। । इनको मोदी से घृणा है सही बात है, इसका देशवासियों कोई दु:ख नही हैं पर ये राजपथ पर नहीं आते तो न सही कम से कम कांग्रेसके मुख्यालय में ही योग दिवस मना लेते अपने कार्यकर्ताओं के साथ। इससे यही साबित होता है कि हिन्‍दू सभ्‍यता से इन्‍हें बहुत घृणा है। आप सोनिया गांधी के सांप्रदायिक रक्षित हिंसा विधेयक को मत भूलियेगा। भले ही लागू न हो पर उससे यही साबित हुआ कि इन ईसाई एजेंट सोनिया व उसके मुस्लिम सेक्रेटरी के इरादे कितने भयावह थे।

क्या आपको लगता है की ये लोग देश का मान-सम्‍मान बढ़ाएंगे ?

सियाचिन से लेकर दक्षिण चीन सागर तक मना योग दिवस

विश्व के 192 देशों, 47 इस्लामिक देशों, संयुक्त राष्ट्र और भारत में राजपथ पर प्रधानमंत्री ने 35000 लोगों सहित शान से मनाया 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' ||
नई दिल्ली। दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन की बर्फ से ढकी चोटियों से लेकर विवादग्रस्त दक्षिण चीन सागर में तैनात युद्धपोतों तक भारतीय सशस्त्र बलों ने आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस में अपनी भागीदारी की।
सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग, एयर चीफ मार्शल अरुप राहा और नौसेना प्रमुख एडमिरल आर के धोवन के नेतृत्व में शीर्ष रक्षा अधिकारियों ने राजपथ पर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर योग किया, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके पर एक विशाल आयोजन की अगुवाई की।



रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने मेरठ में योग दिवस पर आयोजनों में हिस्सा लिया लेकिन सर्वाधिक साहस समुद्र तल से 18,800 फुट की ऊंचाई पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर पर देखने को मिला, जहां प्रतिकूल मौसम में सैनिकों ने योग किया।
सियाचिन के मौसम के अनुकूल विशेष कपड़े पहने इन सैनिकों ने बर्फ में रखी चटाइयों पर बैठकर योग किया। सुबह करीब सात बजे सियाचिन में तापमान शून्य से नीचे चार डिग्री सेल्सियस था।
कारगिल, लद्दाख सहित देश भर में सेना की विभिन्न यूनिटों में भी योग के सत्र संपन्न हुए। नौसेना भी पीछे नहीं रही और उसके केंद्रों में तथा दक्षिण चीन सागर में तैनात भारतीय नौसेना के पोतों में भी योग सत्र हुए।
दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में आईएनएस रणवीर, सतपुड़ा, कामोरता और शक्ति पोतों पर भी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया और इसकी थीम थी ‘एक्रॉस द ओशन्स।’ भारतीय वायु सेना ने भी देश भर में योग सत्र आयोजित किये। न सिर्फ एयरमेनों में लिए बल्कि उनके परिवारों के लिए भी योग सत्र आयोजित किये गए।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर भारत ने 192 देशों की अगुवाई की और राजपथ में भव्य आयोजन हुआ जहां सशस्त्र बलों के कर्मियों, एनसीसी कैडेटों और सरकारी अधिकारियों ने भी योग सत्र में हिस्सा लिया।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पिछले साल दिसंबर में भारत के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के तौर पर मनाने का ऐलान किया था। 175 से अधिक देशों के समर्थन वाले इस प्रस्ताव की मंजूरी के साथ ही इस बात को भी मान्यता मिल गई कि ‘स्वास्थ्य और कल्याण के लिए योग एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है।’ दुनिया भर में 192 देशों के 251 से अधिक शहरों में योग दिवस मनाया गया।

क्या था ऑपरेशन पोलो ?? किस तरह सरदार पटेल ने पहुंचा दिया था 2000 से भी ज्यादा भारत-विरोधी मुसलमानों को सीधा नर्क में

‘’ऑपरेशन पोलो‘’ जब सरदार पटेल ने पहुंचा दिया था 2000 से भी ज्यादा भारत-विरोधी मुसलमानों को सीधा नर्क में.....जब सरदार पटेल भारतीय सेना के जज्बे एक्शन की वजह से आतंकवादियों का स्टेट हैदराबाद भारत में विलय हो गया था....
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आजादी के समय हैदराबाद की जनता भारत में विलय चाहती थी लेकिन हैदराबाद का निजाम मीर उस्मान अली खान बहादुर हैदराबाद को एक स्वतन्त्र देश का रूप देना चाहता था इसलिए उसने भारत में हैदराबाद के विलय कि स्वीकृति नहीं दी।
निज़ाम हैदराबाद के भारत में विलय के किस क़दर ख़िलाफ था , इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने जिन्ना को संदेश भेजकर ये जानने की कोशिश की थी कि क्या वह भारत के ख़िलाफ़ लड़ाई में हैदराबाद का साथ देंगे ताकि हैदराबाद में मुसलमानों का ही शासन बना रहे ??
जिन्ना ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि वो मुट्ठी भर मुसलमानों के लिए अपने पाकिस्तान के अस्तित्व को ख़तरे में नहीं डालेंगे |
निजाम कि इस हेकड़ी को दूर करने के लिए सरदार पटेल ने 13 सितम्बर 1948 को सैन्य कार्यवाही आरम्भ कर दी | यद्यपि वह सैन्य कार्यवाही ही था किन्तु उसे पुलिस कार्यवाही बतलाया गया था जिसका नाम ‘ऑपरेशन पोलो’ रखा गया था ।
इस कार्यवाही से पहले नवाब ने अपने सबसे खासम्खास और हैदराबाद के मशहूर गुंडे कासिम रिजवी को सरदार पटेल को धमकी देने के लिए दिल्ली भेजा | कासिम रिजवी ‘मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (MIM ) नामक पार्टी का मुखिया था और उसने हैदराबाद के हिंदुओं को डराने और दबाने के लिए 2 लाख के करीब कट्टर मुसलमानों कि एक फ़ौज बनाई हुई थी जिसे कि ‘’ रजाकार ‘’ के नाम से जाना जाता था |
( नोट -ओवैसी भाई इसी MIM पार्टी की विचारधारा को आज भी आगे बढ़ा रहे हैं )
कहने को तो हैदराबाद का शासन नवाब के हाथों में था लेकिन बताया जाता है कि नवाब बस कासिम रिजवी के हाथों कि एक कठपुतली भर था और नवाब खुद कासिम रिजवी से डरता था |
कासिम रिजवी और सरदार पटेल के बीच गरमा-गर्म बहस हुई


सरदार पटेल ने कहा –
‘’ हैदराबाद का इतिहास इस बात कि गवाही नहीं देता कि ये भारत से अलग हो ,हैदराबाद हमेशा से भारत कि ही रियासत रहा है,अब चूँकि अंग्रेज जा चुके हैं तो अब आपको और आपके नवाब साहब को भी हैदराबाद का शासन हैदराबाद कि जनता के हाथों में दे देना चाहिए और हैदराबाद कि जनता भारत के पक्ष में है ‘’
कासिम रिजवी ने कहा –
‘’ पटेल साहब आप सरदार होंगे दिल्ली के, हमारे सरदार आप नहीं हैदराबाद के नवाब मीर उस्मान अली खान साहब हैं ,हैदराबाद में पिछले कई सालों से मुसलमानों का शासन है और वही रहेगा ,वो दिन दूर नहीं जब हैदराबाद कि सरहदों को अरब सागर कि लहरें छुएंगी और अगर आप अपने इस रुख पर कायम रहे तो मुसलमानों का जो झंडा आज हैदराबाद के ऊपर लहरा रहा है फिर वो हमें आपकी दिल्ली के लाल किले के ऊपर भी गाड़ने और लहराने पर मजबूर होना पड़ेगा ,इसलिए आपकी और आपके भारत कि भलाई इसी में है कि हैदराबाद को कोई छोटी-मोटी रियासत ना मानकर एक अलग देश के दर्जे में स्वीकार करें ‘’



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सरदार पटेल ने कहा –
‘’ अब अगर आप इस तरह कि ख़ुदकुशी करने पर अड़े ही हुए हैं तो कोई कर भी क्या सकता है, हम बस आपको समझा सकते हैं कि इस प्रकार का रवैया आपके और आपके नवाब साहब के हित में नहीं है ‘’
कासिम रिजवी ने कहा –
‘’ पटेल साहब आपकी इन धमकियों से ओर लोग डरते होंगे हम नहीं डरते और आप हमारी चिंता ना करें,आपको चिंता होनी चाहिए हैदराबाद में मौजूद डेढ़ करोड़ हिंदुओं कि जिनका फिर सफाया करने के लिए हमें मजबूर होना पड़ेगा अगर आप अपनी जिद पर अड़े रहे तो ‘’
कासिम रिजवी कि ये धमकी सुनते ही सरदार पटेल कि आँखों में खून उतर आया लेकिन फिर भी अपने ऊपर पर काबू रखते हुए वे बोले कि –
‘’ अच्छा तो अब बात यहाँ तक पहुँच चुकी है , तो बस एक बात और बताते जाइए कासिम साहब कि आपको क्या लगता है , जब आप हैदराबाद के डेढ़ करोड़ हिंदुओं का सफाया कर रहे होंगे तो उस समय हम क्या कर रहे होंगे ?? ‘’
ये सुनते ही कासिम रिजवी के एक बार तो होश उड़ गए लेकिन फिर वो अनजान बनते हुए बोला – ‘’ हमें क्या मालुम ‘’
सरदार पटेल बोले –
‘’ बस तो फिर जिस बात के बारे में मालुम ना हो वो बात बोलनी नहीं चाहिए,कई बार काफी महंगी पड़ सकती है ‘’
और वो मीटिंग खत्म हो गई | लेकिन सच में कासिम रिजवी को सरदार पटेल को दी गई वो धमकी काफी महंगी पड़ी थी |
इस मीटिंग के बाद कासिम रिजवी और उसकी रजाकार सेना ने हैदराबाद में हिंदुओं का कत्ले-ऐ-आम शुरू कर दिया | हिंदुओं के गाँव के गाँव जला दिए गए और हैदराबाद कि सड़कों पर खून-खराबा होने लगा |
भारतीय सेना के पूर्व उपसेनाध्यक्ष लेफ़्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा अपनी आत्मकथा स्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट में लिखते हैं,
" मैं जनरल करियप्पा के साथ कश्मीर में था कि उन्हें संदेश मिला कि सरदार पटेल उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं. दिल्ली पहुंचने पर हम पालम हवाई अड्डे से सीधे पटेल के घर गए. मैं बरामदे में रहा जबकि करियप्पा उनसे मिलने अंदर गए और पाँच मिनट में बाहर आ गए. बाद में उन्होंने मुझे बताया कि सरदार ने उनसे सिर्फ एक सवाल पूछा कि अगर हैदराबाद के मसले पर पाकिस्तान की तरफ़ से कोई सैनिक प्रतिक्रिया आती है तो क्या वह बिना किसी अतिरिक्त मदद के उन हालात से निपट पाएंगे ?? करियप्पा ने इसका जवाब दिया 'हाँ' और उनके सिर्फ हाँ कहते ही पटेल ने वो बैठक ख़त्म कर दी | “
इसके बाद 12 सितम्बर 1948 को कैबिनेट कि एक बहुत बड़ी बैठक हुई जिसमें नेहरु और पटेल के साथ उस समय भारतीय सेना के सभी बड़े अफसर मौजूद थे | वहाँ पर इस फैसले पर अंतिम मोहर लगाई गई कि जिस प्रकार से हैदराबाद में भारत-विरोधी गतिविधियां चल रही हैं ,पाकिस्तान द्वारा भारी-मात्रा में गोला-बारूद वहाँ भेजा जा रहा है तथा वहाँ की हिंदू जनता जो कि भारत में विलय के पक्ष में है उनका कासिम रिजवी और उसकी रजाकार सेना के द्वारा जिस प्रकार से रोज कत्ले-ऐ-आम किया जा रहा है उसे रोकने के लिए अब वहाँ सेना भेजनी ही होगी |
सरदार पटेल ने कहा कि -
‘’ हैदराबाद भारत के पेट में मौजूद एक कैंसर का रूप लेता जा रहा है जिसका ईलाज एक सर्जिकल ऑपरेशन करके ही सम्भव है | ‘’
मीटिंग में मौजूद सभी सेनाध्यक्षों ने इस पर अपनी सहमती दी लेकिन एक सेनाध्यक्ष जनरल रॉबर्ट बूचर इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे | उनका कहना था कि अभी कश्मीर का मसला सुलझा नहीं है और उससे पहले हैदराबाद में सेना भेजने से हमें दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ेगी जिसके लिए हम अभी तैयार नहीं हैं | जनरल रोबर्ट बूचर ने तो उस मीटिंग में यहाँ तक कह दिया कि अगर मेरी बात नहीं मानी गई तो मैं कल ही अपना इस्तीफा दे दूँगा |
उनके इस्तीफे कि बात सुनकर सारी मीटिंग में सन्नाटा छा गया , डरे हुए नेहरु जी ने सरदार पटेल कि ओर देखा | सरदार पटेल ने मुस्कुराते हुए कहा कि –
‘’ जनरल बूचर आप अगर देना चाहें तो कल क्यों आज से ही अपना इस्तीफा दे दीजिए लेकिन हैदराबाद में ऑपरेशन कल से हर हाल में शुरू होगा ‘’
पटेल जी से इतना सुनते ही जनरल बूचर गुस्से में पैर पटकता हुआ उस मीटिंग से चला गया |
भारतीय सेना और कासिम रिजवी कि कट्टर मुसलमानों वाली रजाकार सेना के बीच 5 दिन तक युद्ध चला ,दो हजार से ज्यादा रजाकारों को भारतीय सेना ने सीधा नर्क में पहुंचा दिया और बाकी के रजाकार बीच मैदान से ही भाग खड़े हुए |
चूँकि हैदराबाद के नवाब कि सेना ने भी भारतीय सेना के खिलाफ रजाकारों का साथ दिया था तो उन्हें भी भारी क्षति उठानी पड़ी और एक प्रकार से हैदराबाद कि सारी सेना इस युद्ध में तहस-नहस हो गई | भारतीय सेना को इस कारवाई में अपने 66 जवान खोने पड़े जबकि 97 जवान घायल हुए
कासिम रिजवी को जिन्दा गिरफ्तार किया गया और भारतीय जेल में डाला गया |
हैदराबाद का नवाब मीर उस्मान अली खान समझ चुका था कि अब उसकी खैर नहीं | भारतीय सेना उसके महल तक आ चुकी थी तो इसलिए अब उसने पाला बदल लिया और अपने रेडियो संदेश में भारत के खिलाफ जंग करने का सारा ठीकरा कासिम रिजवी पर डाल दिया और कहा कि कासिम रिजवी और उसकी सेना ‘’ रजाकारों ‘’ ने ही सारे हैदराबाद में आतंक मचाया हुआ था ,इसमें मेरा कोई हाथ नहीं ,मैं तो उनकी वजह से मजबूर था |
इसके बाद निजाम ने भारत के सामने खुद का और हैदराबाद का आत्म-समर्पण कर दिया | नेहरु और सरदार पटेल ने दरियादिली दिखाते हुए निजाम को गिरफ्तार नहीं किया और थोड़े समय तक उसे ही हैदराबाद का निजाम बने रहने कि ईजाजत दे दी लेकिन अब उसके पास पहले जैसी ताकत नहीं रही थी क्योंकि अब हैदराबाद का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो गया था |
इसके बाद जब सरदार पटेल हैदराबाद आए तो निजाम मीर उस्मान अली खान को उनके स्वागत के लिए हवाई-अड्डे पर ना चाहते हुए भी जाना पड़ा क्योंकि सरदार पटेल कि ताकत वो अब अच्छे से देख और समझ चुके थे |
सरदार पटेल के हवाई जहाज से उतरने पर निजाम ने अपना सिर झुकाकर पटेल का स्वागत किया और कहा कि –
‘’ कभी-२ इंसान से गलतियाँ हो जाया करती हैं ‘’
इस पर सरदार पटेल ने मुस्कुराते हुए कहा कि –
‘’ बिलकुल सही लेकिन फिर उन गलतियों का एक परिणाम भी निकलता है जो कि गलती करने वाले को ही भोगना पड़ता है ,फिर वो उससे बच नहीं सकता ‘’
यदि सरदार पटेल ने उस समय अपनी दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए सैन्य कार्यवाही नहीं किया होता तो आज हैदराबाद भी कश्मीर की तरह से भारत के लिए हमेशा का सरदर्द बन गया होता
Aditi Gupta

Saturday, June 20, 2015

धर्म को स्थिर रखने हेतु कठोर नियमो का पालन आवश्यक होता है......

धर्म को स्थिर रखने हेतु कठोर नियमो का पालन आवश्यक होता है... धर्म कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल नही कि समाज के किसी एक वर्ग, समुदाय को प्रसन्न करने हेतु... Testing Testing खेलते रहें आप ।
ऐसे ही नही किसी को अवतार लेकर महाभारत रचता पड़ता है... परन्तु बिना हड्डी की जिव्हा से धर्मविरुद्ध वाणी का उपयोग करने में अधिक परिश्रम भी नही लगता ।
आज भारत में या विश्व में धर्म का जो भी निम्नतर स्तर आप पाते हैं उनके अपराधी वे समाज सुधारक हैं जिन्होंने धर्म-शास्त्रों के अध्ययन किये बिना... अपने सुधार कार्यक्रमो को धर्म से ऊपर रखा ।




इन्ही लोगों द्वारा समर्थित लोकतन्त्र और धर्म-निरपेक्षता के योग से बने कैंसर का आईना देखिये... कि बुरे को बुरा कहना अपराध होता है और और अच्छे को बुरा कहना बुद्धिजीवी और अभिव्यक्ति की स्व्तंत्रता ।
आगम शास्त्रों में लिखे गए धर्म के नियमो के विरुद्ध जाकर स्वयं को बुद्धिजीवी सिद्ध करने वालों की हठधर्मिता, बालपन, अज्ञानता और महामूर्खता ने आज सम्पूर्ण विश्व को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है ।
ऐसे लोग कभी स्वयम् के व्यापार, व्यवसाय आदि में नियमो का उल्लंघन नहीं करते... असफलता और हानि के भय से, वहां वे अपने व्यवसाय से स्नबन्धित अभ्यस्त लोगों को ऊँचे वेतन देकर अपना कार्य करवाते हैं ... परन्तु धर्म के विषयों पर गूगल wikipedia से दो-चार श्लोक पढ़ कर यही लोग कुतर्क करते हुए Testing Testing खेल जाते हैं ... क्योंकि धर्म में हानि से इनके परिवार और व्यवसाय पर कोई प्रत्यक्ष हानि नही पहुँचती ।
जब धर्म की बात आती है तो एक चाय बेचने वाला भी देवालयों को छोड़कर शौचालयों को पूजने की कु-शिक्षा देता दिखाई देता है... संसार भरा पड़ा है ऐसे नासखेत बुद्धिजीवियों से ।
Perception, Conception और Misconception में वही अंतर होता है जो आकाश से लेकर भूमि तथा और भूमि से लेकर पाताल तक का अंतर होता है ।
धर्म के कार्य धर्मशास्त्रों पर ही छोड़ दिजिए... धर्म को आगे बढ़ाने का कार्य धर्म को अनुभव करने से चलता है... अनुमान, विपर्यय, निद्रा या स्मृति के आधार पर नही ।
जय श्री राम कृष्ण परशुराम
लवी भरद्वाज सावरकर 

Thursday, June 18, 2015

एक बौद्ध भिक्षु जिसने बर्मा से मुसलमानों को खदेड़ दिया

बर्मा देश में जो कार्य बौद्धों ने किया है वो सचमुच काबिले तारीफ़ है.. . अब जैसी कि इस शांतिप्रिय मुस्लिम कौम की आदत होती है ... दुसरे धर्म के लडकियों को फंसा कर निकाह करना और फिर २० बच्चे पैदा करना ..फिर मस्जिद बना कर .. फिर मोहल्ले बसाना और फिर धीरे से मुस्लिम को राजनीती में घुसा कर देश में शासन चलाना और साथ साथ में दंगे आदि कर के वहाँ के मूलनिवासियों कि ह्त्या कर के सफाया करते रहना .... और फिर एक लम्बे समययोजना को अंजाम देते हुए उस देश को मुस्लिम देश बना देना .... तो ऐसे कर रहे थे वहाँ भी जैसा भारत में कर रहे हैं ... . लेकिन बर्मा में ये उल्टा दांव पड़ गया .. संयोग से वहाँ अपने हिन्दू बाबाओं और नेताओं की तरह झूठी एकता और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बौद्ध तो थे ... पर बौद्धों के एक धर्मगुरु की आँख खुली थी ... जिसका नाम हैं विराथु ... और ये थोडा अलग थे ... .


बौद्ध विराथु ने सीधा जंगे एलान कर दिया.... और शान्ति से नहीं....गांधीवादी मार्ग से नहीं.. बुद्ध के उपदेशों के रस्ते से नहीं ... बल्कि हिटलर के रास्ते से . .. सीधा उनकी हत्या... . उनके घरों पर हमला .और देश से बाहर पलायन करने को मजबूर करना ... इन्होने ये कहा कि अगर हमने इनको छोड़ा तो एक दिन देश मुस्लिम देश हो जायेगा.. और हम खत्म हो जायेंगे . ये इतने बच्चे पैदा करते हैं ... हमारे धर्म का अपमान करते हैं ... ये सब नहीं चलेगा ... . यहाँ पर सरकार ने सेकुलरिज्म अपनाते हुए विराथु को २५ साल की सजा सुना दी.. पर उनके जेल जाने के बाद भी देश जलता रहा ... और जब उनकी सजा घटी और १० साल बाद जेल से बाहर आये.. तो लोगों में ऐसा जोश भरा कि आज बर्मा देश मुसलमानों से खाली होने जा रहा है .... जिस मुसलमान को जिधर से भागने का मौका मिल रहा है वो भाग रहा है .. जंगल के रास्ते या समुन्द्र के रास्ते .. और उनकी जहाज को कोई भी देश अपने किनारे नहीं लगने दे रहा है ... सब जानते हैं कि ये ऐसा वायरस है जो जहां लग गया वो बर्बाद हो जायेगा

सयुक्त मानवाधिकार की यांग ली ने सेकुलरिज्म दिखाते हुए बर्मा का दौरा किया था तब विराथु ने की हिम्मत देखिये ... उसने उसे 'कुतिया' और 'वेश्या' कहा ... और धमकी दी " '' आपकी संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठा है, इसलिए आप अपने आप को बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति न समझ लें.''.....इसकी बहुत आलोचना भी हुयी .. . और सबसे बड़ी बात अब हमारे देश के प्रधानमंत्री और नेता के विपरीत वहाँ की राष्ट्रपति थेन सेन कह रहे हैं कि उनको अब अपना रास्ता देख लेना चाहिए . . हमारे लिए महत्वपूर्ण हमारे देश के मूलनिवासी है .... वो चाहें तो शिविरों में ही रहे ... या बांग्लादेश जाए ... . क्या हम हिन्दुओं के लिए भी कोई ऐसा नेत्रित्व करने वाले हिंदूवादी साधू .. या नेता सामने आएगा .. ?

रामध्यान (रमदान ) की मुबारकवाद

रमजान वास्तव में रामध्यान है। पैगंबर यानी प्रगतंबर है, जिस में आकाशवाणी सुनने की शक्ति हो! गाजा पट्टी यहूदी, मुस्लिम और ईसाई तीनों मतों के लिए महत्वपूर्ण है और यहां एक शहर है रामल्लाह यानी राम ही अल्लाह है, लेकिन परमेश्वर नहीं ओंकार नहीं...क्योंकि श्रीराम भी यज्ञ करते थे, संध्या करते थे और पैगंबर भी ध्यान करते थे और जहां तक अल्लाह की बात है, ओम् से अल्हम..और अल्हम से अल्लाह शब्द बना। 

डकार- छींक आए तो अल्हमदुल्लिाह बोलते हैं, दुआ के समय आमीन बोलते हैं, विकृत रूप में ही सही इनमें ओम् शब्द का उच्चारण अवश्य ही ध्यान से चिंतन करने पर नजर आए, इसलिए कहते हैं अल्लाह के सिवाय कोई पूज्य नहीं यानी ओम के सिवाय कोई पूज्य नहीं...राम, कृष्ण हमारे आदर्श हैं, इसमें कोई शंका नहीं, लेकिन ईश्वर को तो वे भी मानते थे। अब लोगों ने अंबेडकर को भी भगवान बना दिया और मजे की बात मोदी सरकार ने पीवी नरसिम्हाराव को भी भगवान का दर्जा दे दिया, उसकी समाधि दिल्ली में बननी शुरू हो गई, इसलिए कि उसका आधा परिवार मुस्लिम है? ताकि कब्रपूजा के लिए एक दिन और राष्ट्रीय अवकाश मिले और सरकारी आफिसों से छुट्टी मिले। जिसे जलाया गया हैदराबाद में उस कांग्रेसी नेता की कब्र दिल्ली में...वाह रे तुष्टिकरण रमजान के अवसर पर...राम को भूल गए...परंतु कब्रपूजा को न भूलोगे? मूर्तिपूजा का यही सबसे बड़ा दोष है कि नेताओं की भी पूजा होने लगती है। वे भी भगवान बन जाते हैं, जबकि अंत्येष्टि के बाद शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है और आत्मा या तो दोबारा जन्म ले लेती है या फिर मोक्ष प्राप्त कर लेती है, फिर ये हिन्दू पीएम कब्रपूजा या समाधिपूजा को बढ़ावा क्यों दे रहे हैं।

यह भाजपा राममंदिर छोड कांग्रेसी नेताओं की कब्र बनाने पर पैसा खर्च करने लगी, रामलला फटी तिरपाल में और नरसिम्माराव की श्मशन की माटी संगमर-मर के चोखटे में...?????????????????

By Farhana Taj

हल्दी घाटी का युद्ध-18 जून 1576

18 जून 1576 
----हल्दी घाटी का युद्ध -----
***मेवाड़ की हल्दीघाटी में हिंदुत्व और स्वधर्म -स्वदेश के स्वाभिमान के तेज की रक्षा करने के लिए जिन्होंने मातृभूमि को अपना रक्त प्रदान किया था ,,उन समस्त बलिदानियों के चरणों में शत शत नमन ---भावभीनी श्रद्धांजली !!!!!***********
437 वर्ष पूर्व ,आज ही के दिन विश्व साक्षी बना था, हल्दी घाटी के भयंकर युद्ध का .....एक और थे देश और धर्म के सम्मान के लिए सर्वस्व लुटाने वाले "" हिन्दू स्वाभिमान के प्रचंड मार्तंड -महाराणा प्रताप """और उनका साथ दे रहे थे वनवासी भील ..झाला - मन्ना जैसे आत्म बलिदानी और ...घोड़ा होकर भी ..मनुष्यों को स्वामिभक्ति का पाठ पढ़ाने वाला चेतक ......दूसरी और थे बड़े बड़े राज्यों के तथा कथित --राजा -महाराजा राजपूत ,,जिन्होंने अपने राज्य की गुलाबी चमक बनाये रखने के लिए अपने घर की बेटियों और बहनों के डोले अकबर के हरम में भेज कर स्वाभिमान और इज्जत को त्याग दिया था ....ये धर्म द्रोही और गद्दार अपनी सेना के साथ ,,इस्लामी दरिन्दे ..अय्याश और व्याभिचारी अकबर को विजय दिलाने के लिए लड़ने आये थे .......इनके साथ थे लाखों सैनिक ...बड़े तोपखाने और बन्दूखें ...दूसरी और था महाराणा प्रताप का सूर्य के तेज को लजाता भाला और भीलों के साधारण धनुष बाण ................. 

बलिदान भूमि


हल्दीघाटी राजपूताने की वह पावन बलिदान भूमि है, जिसके शौर्य एवं तेज़ की भव्य गाथा से इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं। भीलों का अपने देश और नरेश के लिये वह अमर बलिदान, राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम इतिहास में प्रसिद्ध है। यह सभी तथ्य वीरकाव्य के परम उपजीव्य है। मेवाड़के उष्ण रक्त ने श्रावण संवत 1633 वि. में हल्दीघाटी का कण-कण लाल कर दिया। अपार शत्रु सेना के सम्मुख थोड़े-से राजपूत और भील सैनिक कब तक टिकते? महाराणा को पीछे हटना पड़ा और उनका प्रिय अश्व चेतक, उसने उन्हें निरापद पहुँचाने में इतना श्रम किया कि अन्त में वह सदा के लिये अपने स्वामी के चरणों में गिर पड़ा।
उदयसिंह वर्ष 1541 ई. में मेवाड़ के राणा हुए थे, जब कुछ ही दिनों के बाद अकबर ने मेवाड़ की राजधानीचित्तौड़ पर चढ़ाई की। मुग़ल सेना ने आक्रमण कर चित्तौड़ को घेर लिया था, लेकिन राणा उदयसिंह ने अकबर अधीनता स्वीकार नहीं की। हज़ारों मेवाड़ियों की मृत्यु के बाद जब उन्हें लगा कि चित्तौड़गढ़ अब नहीं बचेगा, तब उदयसिंह ने चित्तौड़ को 'जयमल' और 'पत्ता' आदि वीरों के हाथ में छोड़ दिया और स्व्यं अरावली के घने जंगलों में चले गए। वहाँ उन्होंने नदी की बाढ़ रोक 'उदयसागर' नामक सरोवर का निर्माण किया था। वहीं उदयसिंह ने अपनी नई राजधानी उदयपुर बसाई। चित्तौड़ के विध्वंस के चार वर्ष बाद ही उदयसिंह का देहांत हो गया। उनके बाद महाराणा प्रताप ने भी युद्ध जारी रखा और मुग़ल अधीनता स्वीकार नहीं की।

युद्धभूमि पर महाराणा प्रताप के चेतक (घोड़े) की मौत
युद्ध

'हल्दीघाटी का युद्ध' भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है। इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की युद्ध-नीति छापामार लड़ाई की रही थी।अकबर ने मेवाड़ को पूर्णरूप से जीतने के लिए 18 जून, 1576 ई. में आमेर के राजा मानसिंह एवं आसफ ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़लसेना को आक्रमण के लिए भेजा। दोनों सेनाओं के मध्य गोगुडा के निकट अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के मध्य युद्ध हुआ। हल्दीघाटी का युद्ध अनिर्णीत रहा था और नैतिक विजय महाराणा की इसलिए मानी जाती है क्योंकि अपनी सदा स्मरणीय वीरता, युद्ध कौशल और समर् नीति के बल पर उनके थोड़ी सेना ने एक बहुत बड़ी सेना को छका दिया था । यदि स्वयं अकबर के आने की अफवाह न उड़ाई जाती तो मुग़ल सेना के पैर तो युद्धक्षेत्र से दोपहर बाद ही उखड चुके थे । इस युद्ध के बाद अकबर का महाराणा से सामना करने का कभी साहस नहीं हुआ । वास्तव में हल्दीघाटी के अनिर्णीत युद्ध ने भी राजपुताना में हिंदुत्व को सदा के लिए बचा लिया ।खुला युद्ध समाप्त हो गया था, किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। भविष्य में संघर्षो को अंजाम देने के लिए प्रताप एवं उसकी सेना युद्ध स्थल से हट कर पहाड़ी प्रदेश में आ गयी थी। मुग़लों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति अधिक थी।

राजपूतों की वीरता

युद्ध में 'सलीम' (बाद में जहाँगीर) पर राणा प्रताप के आक्रमण को देखकर असंख्य मुग़ल सैनिक उसी तरफ़ बढ़े और प्रताप को घेरकर चारों तरफ़ से प्रहार करने लगे। प्रताप के सिर पर मेवाड़ का राजमुकुट लगा हुआ था। इसलिए मुग़ल सैनिक उसी को निशाना बनाकर वार कर रहे थे। राजपूत सैनिक भी राणा को बचाने के लिए प्राण हथेली पर रखकर संघर्ष कर रहे थे। परन्तु धीरे-धीरे प्रताप संकट में फँसते ही चले जा रहे थे। स्थिति की गम्भीरता को परखकर झाला सरदार मन्नाजीने स्वामिभक्ति का एक अपूर्व आदर्श प्रस्तुत करते हुए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।

मन्नाजी का बलिदान

मान सिंह पर हमला करते हुए महाराणा प्रताप औरचेतक
झाला सरदार मन्नाजी तेज़ी के साथ आगे बढ़ा और उसने राणा प्रताप के सिर से मुकुट उतार कर अपने सिर पर रख लिया। वह तेज़ी के साथ कुछ दूरी पर जाकर घमासान युद्ध करने लगा। मुग़ल सैनिक उसे ही प्रताप समझकर उस पर टूट पड़े। राणा प्रताप जो कि इस समय तक बहुत बुरी तरह घायल हो चुके थे, उन्हें युद्ध भूमि से दूर निकल जाने का अवसर मिल गया। उनका सारा शरीर अगणित घावों से लहूलुहान हो चुका था। युद्ध भूमि से जाते-जाते प्रताप ने मन्नाजी को मरते देखा।

इस प्रकार हल्दीघाटी के इस भयंकर युद्ध में बड़ी सादड़ी के जुझारू झाला सरदार मान या मन्नाजी ने राणा की पाग (पगड़ी) लेकर उनका शीश बचाया। राणा अपने बहादुर सरदार का जुझारूपन कभी नहीं भूल सके। इसी युद्ध में राणा का प्राणप्रिय घोड़ा चेतक अपने स्वामी की रक्षा करते हुए शहीद हो गया